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दरभंगा में दीपावली पर घरों को रोशन करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक झालरों, रंग-बिरंगी लाइटों और बिजली के बल्बों का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके बावजूद मिट्टी के दीयों की परंपरा आज भी कायम है। दीपावली के मौके पर शहर के मौलागंज और हसनचक में मिट्टी के दीयों की दुकानों पर कुछ लोग खरीदारी करते नजर आए। हालांकि, पहले की तुलना में खरीदारों की संख्या कम हुई है, लेकिन कई लोग आज भी पुरानी परंपरा और संस्कृति को जीवित रखने के लिए मिट्टी के दीये खरीदना पसंद कर रहे हैं। बिजली की रोशनी के बीच दीयों का अलग आकर्षण मिट्टी के दीयों का दीपावली से सदियों पुराना रिश्ता रहा है। पहले घरों के आंगन, छत, दरवाजे और मंदिर मिट्टी के दीयों से ही रोशन होते थे। समय के साथ बिजली की सजावट का चलन बढ़ा, लेकिन मिट्टी के दीयों की लौ का आकर्षण आज भी बरकरार है। लोगों का मानना है कि दीपावली का असली आनंद मिट्टी के दीयों की रोशनी में ही है। इनकी लौ घर में अलग रौनक और अपनापन पैदा करती है। बिक्री घटने से कुम्हार परिवारों की आजीविका पर संकट मिट्टी के दीये बनाने और बेचने वाली कुम्हार संजू देवी ने बताया कि अब उनके पारंपरिक कारोबार की स्थिति पहले जैसी नहीं रही। खासकर कोरोना लॉकडाउन के बाद से मिट्टी के दीयों की बिक्री में काफी गिरावट आई है। ग्राहक कम संख्या में दीये खरीदने पहुंचते हैं। इलेक्ट्रॉनिक झालरों और आधुनिक लाइटों के बढ़ते इस्तेमाल से उनका पारंपरिक व्यवसाय प्रभावित हुआ है। उन्होंने बताया कि मिट्टी के दीये बनाना और बेचना ही उनके परिवार की आजीविका का मुख्य साधन है। बिक्री कम होने से परिवार का भरण-पोषण करना भी मुश्किल हो रहा है। खरीदार बोले- परंपरा को बचाने के लिए दीये जलाना जरूरी मिट्टी के दीये खरीद रहे मुकुल, दिव्यांशी, प्रियम और अभिषेक ने कहा कि दीपावली का असली महत्व मिट्टी के दीयों में ही है। दीये की लौ से घर में अलग तरह की रौनक और अपनापन महसूस होता है। यह हमारी सदियों पुरानी परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि लोगों को आधुनिक लाइटों के साथ मिट्टी के दीयों का भी इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि कुम्हारों की आजीविका चलती रहे और पारंपरिक कला एवं संस्कृति भी सुरक्षित रह सके।
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दरभंगा-इलेक्ट्रॉनिक लाइटों के चलते मिट्टी के दीयों का चलन कम:मौलागंज-हसनचक में दुकानों पर पहुंचे खरीदार, बिक्री घटने से कुम्हार परिवारों की आजीविका पर असर
