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पौराणिक मान्यताओं से लेकर धार्मिक आस्थाओं तक की इस यात्रा के दूसरे पड़ाव में हमने प्रयागराज से करीब 125 किमी दूरी तय करके चित्रकूट में कदम रख दिए। प्रयागराज के अक्षय वट व लेटे हनुमान मंदिर से लेकर चित्रकूट के वाल्मीकि आश्रम और सती अनुसुइया मंदिर तक के इस सफर में श्रीराम के पदचिह्नों की छाप देखिए… वाल्मीकि आश्रम से निकलकर प्रभु श्रीराम और सीताजी अक्षय वट के नीचे रुके थे और लक्ष्मण उनकी निगरानी कर रहे थे। अभी यह अक्षय वट प्रयागराज संगम तट पर इलाहाबाद फोर्ट के अंदर है। पुजारी मोहन जोशी बताते हैं- ‘ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सृष्टि की स्थिरता के लिए इसकी स्थापना की थी। ब्रह्मा जी ने यहां 31 करोड़ देवी-देवताओं के साथ 10 बार हवन-यज्ञ किया था। वनवास के दौरान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने यहां तीन दिन विश्राम किया था। पतझड़ में भी इसके पत्ते नहीं सूखते। द्वापर युग में भगवान विष्णु ने वाल्मीकि और मार्कण्डेय जी को बालमुकुंद के रूप में दर्शन दिए थे और कहा था कि महाराज! मांगिए क्या वर मांगना चाहते हैं, तो मुनिवर ने कहा कि मैं प्रलय देखना चाहता हूं। तो उन्होंने अपनी शक्तियों से उन्हें प्रलय दिखाया। पूरे ब्रह्मांड को जलमग्न कर दिया, लेकिन यही एक वट वृक्ष था, जो सुरक्षित था। 17वीं सदी में मुगल शासक औरंगजेब ने इसे छत्तीसों बार कटवाया, पर इसका नाश नहीं हुआ। फिर जड़ों में तेजाब डालना शुरू कर दिया, फिर भी यह भस्म नहीं हुआ। आखिर में उसने इसे लोहे की चादर से बंद कर दिया, ताकि कोई देख न सके। आजादी के बाद इसे आम लोगों के दर्शन के लिए खोला गया। अभी यह सेना के जिम्मे है।’ चित्रकूट से करीब 20 किमी पहले आता है वाल्मीकि आश्रम यह स्थान वाल्मीकि जी की तपोस्थली थी। यहीं माता सीता ने लव-कुश को जन्म दिया था। करीब 425 सीढ़ियां चढ़ने के बाद वह कुटिया मिलती है, जहां वाल्मीकि जी तपस्या करते थे। चित्रकूट में श्रीराम सबसे पहले यहीं आए थे। महर्षि ने उनसे कहा था- मुझे पता है प्रभु कि ये आपका मानव अवतार है, इसलिए बताता हूं कि आप चित्रकूट के जंगलों में निवास करें। जिसके बीच से मंदाकिनी गंगा नदी बहती है। इसे धरती पर लाने का श्रेय सती अनुसुइया को जाता है। हम चित्रकूट में सती अनुसुइया के भव्य मंदिर भी गए। यहां ऐसी प्रतिमा है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश बालरूप में पालने में लेटे हैं और पास में मां सती अनुसुइया की बड़ी मूर्ति है। हम चौंके तो पुजारी ने बताया- ‘ब्रह्मा, विष्णु और महेश साधु वेष बनाकर सती अनुसुइया की परीक्षा लेने आए थे। उन्होंने अनुसुइया के सामने निर्वस्त्र होकर भोजन देने की शर्त रख दी। अपने तपोबल से अनुसुइया समझ गईं कि ये त्रिदेव हैं। उन्होंने पवित्र भाव से पति के चरणामृत का जल उन पर छिड़क दिया, जिससे वे अबोध शिशु में बदल गए। फिर उन्हें वात्सल्य भाव से दूध पिलाया और पालने में सुला दिया। लंका विजय के बाद यहां लेटे थे हनुमानजी अक्षय वट से चंद कदम दूर है- लेटे हनुमान जी का मंदिर। उनके एक हाथ में राम-लक्ष्मण की प्रतिमा, दाएं पैर के नीचे मार्कण्डेय और बाएं पैर के नीचे अहिरावण की प्रतिमा है। पुजारी महाराज ने बताया- ‘लंका विजय से लौटते समय जब श्रीराम और सीता भारद्वाज ऋषि से आशीर्वाद लेने गए थे, तो सीता जी ने सिंदूर के लेप के साथ हनुमानजी को यहां विश्राम करने के लिए कहा था। मंदिर में जो मूर्ति है, वह 15वीं सदी में कुंभ का टेंट लगाते समय जमीन से निकली थी।
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राम वन गमन पथ यात्रा, भाग-2; प्रयागराज से चित्रकूट:वो अक्षय वट… जो न प्रलय में जलमग्न हुआ, न तेजाब से भस्म हुआ
