कैप्टन अमरिंदर सिंह और पीएम मोदी की फाइल फोटो
पंजाब के पूर्व CM और सीनियर भाजपा नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अब BJP को कांग्रेस जैसे तेवर दिखाए हैं। कैप्टन ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछ लिया कि ‘दिमागी नक्सल’ का मतलब क्या है। असहमति को नक्सलवाद के दायरे में नहीं रख सकते। कैप्टन ने एक आ
.
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा-
जब प्रधानमंत्री किसी वर्ग को ‘पहचानने’ और ‘अलग-थलग’ करने की बात कहते हैं, तो यह साफ होना चाहिए कि ‘दिमागी नक्सल’ और जायज असहमति के बीच सीमा रेखा क्या है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि नक्सल शब्द का इस्तेमाल हल्के तरीके से नहीं किया जाना चाहिए। भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक आजादी में से किसी एक को नहीं चुनना चाहिए। सही तरीके से समझा जाए तो दोनों एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।
कैप्टन ने कहा-
अगर यह शब्द उन लोगों के लिए है जो जानबूझकर माओवादी हिंसा को बढ़ावा देते हैं, तो यह अंतर स्पष्ट किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसके लिए जायज और असहमति को नक्सलवाद के दायरे में नहीं रखा जा सकता। इस पर लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी।

बता दें कि PM ने 15 अगस्त को लाल किले से दिए अपने भाषण में ‘दिमागी नक्सलवाद’ से बचने की बात कही थी। इससे पहले जब कैप्टन कांग्रेस में थे तो वह सीधे हाईकमान के फैसलों पर सवाल खड़े कर देते थे। यहां तक कि कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री होने के बावजूद राहुल गांधी के बयानों के उलट अपना स्टैंड व्यक्त कर देते थे।

‘दिमागी नक्सलवाद’ पर कैप्टन की बड़ी बातें जानिए….
हिंसा का नेटवर्क सिर्फ हथियारबंद लोगों तक सीमित नहीं
कैप्टन ने कहा कि नक्सली संगठन सिर्फ बंदूक उठाने वाले कैडरों के भरोसे नहीं चलते। भर्ती, फंडिंग, पनाह, प्रचार और लॉजिस्टिक्स से जुड़े लोग भी हिंसा के नेटवर्क को मदद पहुंचा सकते हैं। जो लोग हिंसा के लिए फंडिंग, भर्ती, साजिश रचने में मदद करते हैं, उनके खिलाफ सबूत के आधार पर कानून के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
‘दिमागी नक्सल’ कोई कानूनी श्रेणी नहीं
‘दिमागी नक्सल’ एक राजनीतिक अभिव्यक्ति है, कानून में अपराध की कोई अलग श्रेणी नहीं। किसी व्यक्ति को सिर्फ उसकी विचारधारा या सोच के आधार पर अपराधी नहीं माना जा सकता। कार्रवाई के लिए उसके कार्य, साजिश, उकसावे या हिंसा में भूमिका के ठोस सबूत जरूरी हैं।
युवाओं का प्रोटेस्ट ‘नक्सलवाद’ नहीं
आर्टिकल में यह भी कहा गया कि परीक्षा को लेकर प्रदर्शन करने वाले छात्र, नौकरी की मांग कर रहे युवा या सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले किसान सिर्फ विरोध करने की वजह से ‘दिमागी नक्सल’ नहीं हो जाते। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है। किसी को सिर्फ उसकी असहमति या विरोध के आधार पर उग्रवादी मानना गलत होगा; कार्रवाई तभी होनी चाहिए जब हिंसा भड़काने, साजिश, फंडिंग या हिंसक गतिविधियों में जानबूझकर मदद के सबूत हों।
‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा स्पष्ट करना जरूरी
प्रधानमंत्री के भाषण के बाद इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक दलों, टीवी बहसों और सोशल मीडिया में अलग-अलग संदर्भों में हो सकता है। इसलिए इसका मतलब साफ करना जरूरी है कि ‘दिमागी नक्सल’ से किन लोगों की बात हो रही है। अगर मतलब हिंसा को जानबूझकर बढ़ावा देने या उसकी मदद करने वालों से है, तो उनकी पहचान और कार्रवाई का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए।
हर आलोचक को ‘राष्ट्र-विरोधी’ मानना खतरनाक
छात्रों का परीक्षा को लेकर विरोध, युवाओं की रोजगार की मांग, किसानों का नीतियों पर सवाल, आदिवासियों का विस्थापन का विरोध या पत्रकारों की सुरक्षा अभियान पर निगरानी अपने आप में उग्रवाद नहीं है। सरकार से असहमति नागरिक अधिकार का हिस्सा है।
BNS की धारा 152 में भी आलोचना और अपराध में फर्क
कैप्टन अमरिंदर ने आगे कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान करती है। वहीं, सरकार की नीतियों या प्रशासनिक फैसलों की वैध तरीके से आलोचना को अपराध से अलग रखा गया है। यानी सरकार का विरोध और देश के खिलाफ गतिविधि एक ही बात नहीं है।
नक्सलवाद के खिलाफ असली जीत सिर्फ हथियार खत्म करने से नहीं
हथियारबंद नक्सलवाद कमजोर होना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन लंबे समय की सफलता के लिए प्रभावित इलाकों में विकास और भरोसा जरूरी है। स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार, बेहतर प्रशासन और राजनीतिक भागीदारी मजबूत होने से युवाओं के सामने हिंसा के बजाय विकास का रास्ता मजबूत होगा। असली जीत तब होगी, जब लोगों को बात रखने के लिए बंदूक की जरूरत महसूस न हो।

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में क्या कहा था…
माओवादी सोच ने नीतियों को प्रभावित किया
पीएम मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन में कहा था कि वर्षों तक माओवादी सोच रखने वाले लोग सत्ता के गलियारों में जगह बनाए रहे। सरकारी कमेटियों में सलाहकार बनकर भी उन्होंने नीतियों को प्रभावित किया।
‘दिमागी नक्सल’ को पहचानना होगा
पीएम मोदी ने कहा था कि जंगलों में हथियारबंद नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ अब भी हिंसा और अराजकता के मौके तलाश रहे हैं। ऐसे लोगों को पहचानकर अलग-थलग करना होगा और युवाओं को राष्ट्र निर्माण से जोड़ना होगा।
———————
यह भी पढ़ें- मोदी बोले- दिमागी नक्सलियों को पहचानें, उन्हें अलग करें:ये समाज को भटका रहे; महिलाओं के आरक्षण पर पार्टियां राजनीति न करें

80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पीएम मोदी ने लाल किले पर 75 मिनट की स्पीच दी। पीएम ने कहा- ‘हथियारी नक्सल तो चले गए, लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। समाज को गलत राह पर ले जाने के लिए तरह-तरह के काम कर रहे हैं।’ पूरी खबर पढ़िए…
