Headlines

Israel Election 2026 | Netanyahu PM Race & Voting System Explained


इजराइल में कल, यानी 27 अक्टूबर को वोट पड़ेंगे। सर्वे में मौजूदा पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी विपक्षी आइजनकोट से पिछड़ रही है। इसके बावजूद नेतन्याहू के 7वीं बार प्रधानमंत्री बनने का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होगा। इसकी वजह है इजराइल का अनोखा चुनाव

.

साल- 1907, ब्रिटेन का एक यहूदी केमिस्ट चाइम वाइजमैन पहली बार फिलिस्तीन पहुंचा और जाफा इलाके में एक कंपनी खोली। धीरे-धीरे दुनियाभर से सताए हुए यहूदी फिलिस्तीन पहुंचने लगे। वो यहां जमीनें खरीदते, खेती और व्यापार करते। आबादी बढ़ती गई।

1948 में इजराइल नया देश बना। तब तक यहां 70 से ज्यादा देशों से यहूदी आकर बस चुके थे। जमीनी सीमाएं तय नहीं थीं। हर समूह की भाषा, संस्कृति और राजनीति अलग थी। सभी को प्रतिनिधित्व देना जरूरी था।

ऐसे में पूरा देश एक निर्वाचन क्षेत्र मानकर प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन सिस्टम अपनाया गया, यानी जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।

इजराइल के इसी अनोखे इलेक्शन सिस्टम को आसानी से समझने के लिए 7 पॉइंट्स से गुजर जाइए…

1. पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र

  • भारत में लोकसभा की 543 अलग-अलग सीटें हैं। इसमें वाराणसी का वोटर सिर्फ वाराणसी का सांसद चुनता है। इजराइल में ऐसा कोई इलाका नहीं है। पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र है और 120 सीटों की नेसेट (संसद) के लिए सब एक साथ वोट डालते हैं।

2. वोट पार्टी को मिलते हैं, किसी एक उम्मीदवार को नहीं

  • सभी पार्टियां चुनाव से पहले 120 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करती हैं। वोटर किसी एक उम्मीदवार को नहीं, बल्कि पार्टी की पूरी लिस्ट को वोट देते हैं। भारत की तरह 18 साल से ज्यादा उम्र के इजराइली नागरिक वोट डाल सकते हैं। वहां बैलेट पेपर के जरिए चुनाव होते हैं, ईवीएम जैसी मशीन से नहीं।
पोलिंग बूथ में हर पार्टी की पर्चियां रखी होती हैं। वोटर पसंदीदा पार्टी की एक पर्ची उठाकर लिफाफे में बंद करके बैलेट बॉक्स में डाल देते हैं।

पोलिंग बूथ में हर पार्टी की पर्चियां रखी होती हैं। वोटर पसंदीदा पार्टी की एक पर्ची उठाकर लिफाफे में बंद करके बैलेट बॉक्स में डाल देते हैं।

3. वोट शेयर के हिसाब से सीटों का बंटवारा

  • भारत में सबसे ज्यादा वोट वाला उम्मीदवार जीतता है, चाहे उसका वोट शेयर 30% ही क्यों न हो। इसे फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट कहते हैं।
  • इजराइल में वोट शेयर के अनुपात में सीटें मिलती हैं। मसलन- अगर किसी पार्टी को कुल 10% वोट मिले, तो उसे 120 सीटों वाली नेसेट की करीब 12 सीटें मिलेंगी।

4. सीट पाने के लिए कम से कम 3.25% वोट जरूरी

  • छोटी-छोटी सैकड़ों पार्टियां इलेक्शन को बहुत जटिल न बना दें, इसलिए इजराइल में 3.25% का इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड तय किया गया है। यानी पार्टियों को नेसेट पहुंचने के लिए कम से कम 3.25% चाहिए। जो पार्टी इससे नीचे रह जाती है, उसे कोई सीट नहीं मिलती और उसके वोट गिनती से बाहर हो जाते हैं।
  • मान लीजिए कुल 40 लाख वोट पड़े। इसका 3.25% हुआ 1.3 लाख वोट। अब अगर किसी पार्टी को 1.3 वोट मिले हैं, तो उसे नेसेट में सीट मिलेगी। वहीं किसी को 1.29 लाख वोट मिले, तो वह बाहर और उसके सारे वोट बेकार।

5. नेसेट की सीटों का बंटवारा

ये प्रोसेस 2 राउंड में पूरा होता है…

राउंड-1: पूरी सीटों का बंटवारा

  • मान लीजिए इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड लागू होने के बाद 24 लाख वैध वोट बचे। ऐसे में एक सीट का जरूरी कोटा हुआ- 24,00,000 ÷ 120 = 20,000 वोट।
  • अगर A पार्टी को 9.1 लाख, B को 6.3 लाख, C को 4.7 लाख और D को 3.9 लाख वोट मिले। अब 20 हजार वोट के कोटे के हिसाब से A की 45 सीटें, B की 31, C की 23 और D की 19 सीटें पक्की।
  • इसके बाद भी हर पार्टी के 0.5% वोट बच गए। हालांकि पहले राउंड में 118 सीटें बंट गईं और 2 सीटें बच गईं।

राउंड-2: बची सीटों का बंटवारा

  • इसके लिए बेडर-ऑफर फॉर्मूला अपनाया जाता है। इसके तहत हर पार्टी के वोट को उसे मिली सीटों+1 से भाग दें। जिसका नतीजा सबसे बड़ा, उसे अगली सीट मिल जाएगी।
  • ऐसे समझिए कि A को मिले 9.1 लाख वोट में 45+1, यानी 46 से भाग देने पर 19782 आएगा। ऐसे ही B के लिए 19688, C के लिए 19584 और D के लिए 19500 आएंगे।
  • यानी सबसे बड़ा नतीजा A का है, तो उसे पहली बची सीट मिल जाएगी और A की कुल सीटें 46 हो जाएंगी।
  • यही फॉर्मूला आगे बार-बार लगता रहेगा, जब तक कि सभी सीटें नहीं बंट जातीं। लेकिन इसके चलते बची सीटें अक्सर बड़ी पार्टियों को मिल जाती हैं।

इस बंटवारे में एक दिलचस्प पेच है…

  • दरअसल, चुनाव पहले कुछ पार्टियां आपस में सरप्लस वोट एग्रीमेंट कर लेती हैं, जिसके चलते बची सीटों के बंटवारे में उनके वोट जोड़कर गिने जाते हैं। लेकिन हर पार्टी को कम से कम 3.25% वोट पाना जरूरी है।
  • मान लीजिए कि C और D ने चुनाव से पहले एग्रीमेंट किया, तो उनका हिसाब 8,60,000 ÷ 43 = 20,000 आएगा। यह A के 19782 से ज्यादा है, तो पहली बची सीट C और D की जोड़ी को मिलेगी। फिर जोड़ी में C (19584), D (19500) से आगे है, यानी सीट C को मिलेगी।
  • यानी अकेले-अकेले जो सीट A को मिलती, जोड़ी बनाने से C के पास चली गई।

जिस पार्टी को जितनी सीटें मिलीं हैं, उस पार्टी की कैंडिडेट लिस्ट के शुरुआती उतने नाम ही नेसेट पहुंचेंगे। जैसे- A को 46 सीटें मिलीं, तो उसकी लिस्ट के पहले 46 नाम सांसद बन जाएंगे। ऐसे में पार्टी का नेता तय करता है कि किसका नाम ऊपर रहे।

6. प्रधानमंत्री कौन बनेगा?

  • भारत में जैसे राष्ट्रपति बहुमत वाले नेता को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं, वैसा ही इजराइल में भी है, लेकिन एक फर्क है।
  • इजराइल के राष्ट्रपति सरकार बनाने का मौका उस सांसद को देते हैं, जिसके बहुमत जुटाने और सरकार बनाने की संभावना सबसे ज्यादा हो। इसके लिए जरूरी नहीं है कि वह सांसद सबसे बड़ी पार्टी का नेता हो।
  • दरअसल, इजराइल के 78 साल के चुनावी इतिहास में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, यानी नेसेट की 120 में से 61 सीटें नहीं जीतीं हैं। ऐसे में हर बार गठबंधन की सरकार बनती है और राष्ट्रपति द्वारा तय किए नेता को बहुमत जुटाना होता है।
  • नेता को सरकार बनाने के लिए 28 दिन मिलते हैं। राष्ट्रपति चाहें तो 14 दिन का मौका और दे सकते हैं। उसे नेसेट में अपनी सरकार, मंत्री और नीतियां पेश करनी पड़ती हैं। फिर वोटिंग में मौजूद सांसदों का बहुमत मिल जाता है, तो उसकी सरकार बन जाती है।
  • 2021 में नफ्ताली बेनेट की पार्टी ‘यामिना’ के पास सिर्फ 7 सांसद थे। फिर भी वे प्रधानमंत्री बने, क्योंकि विपक्षी दलों ने उन्हें समर्थन दिया।
जून 2021 में पीएम पद संभालने के बाद नेफ्ताली बेनेट (सबसे बाएं), राष्ट्रपति रूवेन रिवलिन (बीच में) और विदेश मंत्री यायर लापिड (सबसे दाएं)।

जून 2021 में पीएम पद संभालने के बाद नेफ्ताली बेनेट (सबसे बाएं), राष्ट्रपति रूवेन रिवलिन (बीच में) और विदेश मंत्री यायर लापिड (सबसे दाएं)।

7. अगर कोई गठबंधन न बने तो?

  • अगर पहला नेता सरकार नहीं बना पाता है, तो राष्ट्रपति दूसरे सांसद को मौका दे सकते हैं। अगर वो भी सरकार नहीं बना पाता है, तो नेसेट को मौका दिया जाता है।
  • अगर इन 3 कोशिशों के बाद भी सरकार न बने, तो नेसेट भंग मान ली जाती है और 90 दिन के भीतर दोबारा चुनाव होते हैं। तब तक पुरानी सरकार काम करती रहती है।
  • नेसेट का कार्यकाल 4 साल का है, लेकिन 78 साल में 25 बार चुनाव हो चुके हैं। अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच 3.5 साल में तो 5 बार चुनाव हुए।

1949 से लेकर आज तक इजराइल में किसी भी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिला है। इसकी 3 वजहें हैं…

1. वोट शेयर के हिसाब से सीटों का बंटवारा: नेसेट में सीटें पार्टी को मिले वोट शेयर के अनुपात में बंटती हैं। ऐसे में बहुमत की 61 सीटें पाने के लिए किसी भी पार्टी को कम से कम 51% की जरूरत है, जो बहुत मुश्किल है। जबकि भारत में अमूमन 35-40% वोट पर लोकसभा में आधी सीटें मिल सकती हैं। 1969 में गोल्डा मायर के अलाइनमेंट (लेबर अलायंस) बहुमत के सबसे नजदीक पहुंचा। उसे 46.2% वोट और 56 सीटें मिली थीं।

1969 के चुनाव में वोट डालती हुईं गोल्डा मायर। वे इजराइल की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं।

1969 के चुनाव में वोट डालती हुईं गोल्डा मायर। वे इजराइल की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं।

2. कई खेमों में बंटा समाज: इजराइली थिंकटैंक ‘इजराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट’ के सीनियर फेलो प्रो. गिदोन राहत के मुताबिक, इजराइल का समाज कई हिस्सों में बंटा हुआ है। जैसे- सेकुलर यहूदी बनाम अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स, अशकेनाजी बनाम मिजराही, यहूदी बनाम अरब। हर समूह की अपनी अलग पार्टी है, इसलिए वोट बिखर जाते हैं। जैसे- सेकुलर यहूदी येश अतीत, अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स शास, राष्ट्रीय-दक्षिणंपथी लिकुड और अरब-इजराइली रा’आम को अमूमन वोट देते हैं।

3. कम इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड: शुरुआत में 1% वोट पाने वाली पार्टियों को भी नेसेट में जगह मिल जाती थी। फिर इसे बढ़ाकर 1.5%, 2% और अब 3.25% किया गया, ताकि छोटी पार्टियां कम हों। इसके बावजूद औसतन 11-12 पार्टियां इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड पार कर लेती हैं। औसतन 3 पार्टियां ही 10 से ज्यादा सीटें हासिल कर पाती हैं। वहीं औसतन 5-6 छोटी पार्टियों को 4-6 सीटें मिल जाती हैं।

क्या चुनाव के बाद नेतन्याहू फिर से सरकार बना पाएंगे?

ऐसा 38 साल बाद हो रहा है कि नेसेट के पूरे 4 साल के कार्यकाल के बाद चुनाव हो रहा है। इस बार 37 पार्टियां चुनावी मैदान में हैं। करीब 73 लाख लोग वोटर हैं, जबकि कुल आबादी 1.03 करोड़ है। सबसे ज्यादा 76% यहूदी हैं। फिर 22.1% अरब और 2.9% विदेशी हैं।

मुख्य मुकाबला 2 मोर्चों के बीच है…

  1. सत्ताधारी खेमा: बेंजामिन नेतन्याहू की ‘लिकुड’, इतामार बेन-गवीर की ‘ओत्जमा येहुदित’, बेजलेल स्मोट्रिच की ‘रिलिजियस जियोनिस्ट पार्टी’, अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स ‘शास’ और ‘यूनाइटेड तोराह जुडैइज्म’।
  2. विपक्षी खेमा: गादी आइजनकोट की ‘याशार’, नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड का विलय गठबंधन ‘टुगेदर’, एविग्डोर लिबरमैन की ‘इजराइल बेइतेनु’ और यायर गोलान की ‘द डेमोक्रेट्स’।
गादी आइजनकोट (खाकी वर्दी में) पहले नेतन्याहू की वॉर कैबिनेट में ऑब्जर्वर रह चुके हैं। इससे पहले वे इजराइल डिफेंस फोर्स के चीफ भी थे।

गादी आइजनकोट (खाकी वर्दी में) पहले नेतन्याहू की वॉर कैबिनेट में ऑब्जर्वर रह चुके हैं। इससे पहले वे इजराइल डिफेंस फोर्स के चीफ भी थे।

इसके अलावा मंसूर अब्बास की रा’आम, यूसेफ जबारीन की ‘जॉइन्ट लिस्ट’ जैसी अरब पार्टियां और योअज हेंडेल और यारोन जेलिखा का ‘द रिजर्विस्ट्स’ अलायंस जैसे गुट भी मुकाबले में हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस बार के चुनाव में ये छोटे गुट ‘किंगमेकर’ बन सकते हैं, खासतौर पर अरब पार्टियां।

दरअसल, इजराइल के 3 बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म्स- चैनल 12, चैनल 13 और कान 11 के फाइनल पोल में किसी भी अलायंस को बहुमत नहीं मिला। सत्ताधारी खेमे को 49 से 51 और विपक्षी खेमे को 51 से 53 सीटें दी हैं।

ज्यादातर पोल में पूर्व आर्मी चीफ गादी आइजनकोट की पार्टी ‘याशर’ को बढ़त है। याशर को 22 से 23 सीटें मिल सकती हैं, जबकि 19 साल पीएम रहे नेतन्याहू की लिकुड को 19 से 21 सीटें।

माना जा रहा है कि अगर अरब पार्टियों ने 10 सीटें भी हासिल कर लीं, तो वही तक करेंगी कि सत्ता कौन संभालेगा?

इजराइली मीडिया में इस चुनाव को अक्टूबर 2023 में शुरू हुई जंग के बाद का पहला चुनाव और नेतन्याहू की लीडरशिप पर जनमत जैसा बता रही हैं। नेतन्याहू पर जंग की आड़ में अपनी सरकार बचाने के आरोप लगे हैं। उन पर भ्रष्टाचार का मुकदमा भी चल रहा है।

‘फ्लाई एंड वोट’ नाम की एक मुहिम भी चल रही है, जिसके तहत विदेशों में रह रहे इजराइली वोटर्स देश आकर वोट डाल रहे हैं। यहूदी मीडिया वेबसाइट ‘फॉरवर्ड’ के मुताबिक, करीब 5 लाख इजराइली वोटर्स विदेशों में रहते हैं, जिनमें से करीब 53 हजार वोटर वोट डालने के लिए इजराइल जा रहे हैं और ये 67 हजार तक हो सकते हैं।

गाजा जंग की जांच को लेकर इजराइल में प्रदर्शन हो रहे हैं और बदलाव की मांग की जा रही है। इसी के चलते विदेशों में रहने वाले इजराइली वोटर भी देश लौट रहे हैं।

गाजा जंग की जांच को लेकर इजराइल में प्रदर्शन हो रहे हैं और बदलाव की मांग की जा रही है। इसी के चलते विदेशों में रहने वाले इजराइली वोटर भी देश लौट रहे हैं।

अमेरिका के लॉस एंजिल्स में रहने वाले एडम पाइंस वोट डालने के लिए इजराइल के तेल अवीव पहुंच गए हैं। वे मानते हैं कि इजराइल ने अपनी नैतिक दिशा खो दी है। नेतन्याहू इजराइल की हिफाजत करने में नाकाम रहे हैं। उनकी कार्रवाइयों से दुनियाभर के यहूदियों और इजराइलियों पर असर पड़ा है।

विदेशों से लौट रहे ज्यादातर वोटर नेतन्याहू के खिलाफ हैं। इसी के चलते लिकुड पार्टी ने केंद्रीय चुनाव समिति से ‘फ्लाई एंड वोट’ मुहिम रोकने की मांग की है।

————

ये खबर भी पढ़िए…

क्या पाकिस्तानी पायलट भी प्लेन भारत ला सकते हैं; इजराइल की फ्लाइट में कैसे पहुंचा ओमानी अल-हमामी, असली इरादा क्या था

कैप्टन स्मित मच्छर पर चाकू से नहीं, क्रैश एक्स से हमला हुआ था। कॉकपिट में रखी इस कुल्हाड़ी का इस्तेमाल इमरजेंसी में विंडो वगैरह तोड़ने में होता है। इसे चलाने वाले हमलावर को-पायलट हमाम अल-हमामी की कहानी भी खुल गई है। पूरी खबर पढ़िए…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

    OpenBuk Bharat (ओपनबुक भारत) आपका भरोसेमंद डिजिटल न्यूज़ पोर्टल है। हम राष्ट्रीय, प्रादेशिक (बिहार), वाणिज्य, और मनोरंजन जगत की हर बड़ी खबर निष्पक्षता और सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।