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16 हजार किमी की विश्व एकता कांवड़ यात्रा पर बुजुर्ग:औरंगाबाद में हुआ स्वागत, बोले- कोरोना में जान गंवाने वालों की आत्मा की शांति की कामना है




उम्र के 71वें पड़ाव पर जहां अधिकांश लोग आराम करना पसंद करते हैं, वहीं इंदौर के लक्ष्मण समाज सेवा और विश्व शांति का संदेश लेकर हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकले हैं। कोरोना महामारी, सड़क हादसों और देश की रक्षा में शहीद हुए वीर जवानों सहित असमय काल के गाल में समा गए लोगों की आत्मा की शांति के उद्देश्य से उन्होंने विश्व राष्ट्रीय एकता कांवड़ यात्रा शुरू की है। करीब 16 हजार किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुके लक्ष्मण रविवार की सुबह साढ़े आठ बजे वापसी के दौरान औरंगाबाद पहुंचे। यहां स्थानीय लोगों ने उनका स्वागत किया और उनके प्रयासों की सराहना की। लक्ष्मण ने अपनी इस अनूठी यात्रा की शुरुआत 7 जुलाई 2024 को की थी। उनका उद्देश्य केवल धार्मिक यात्रा करना नहीं, बल्कि देश-दुनिया में शांति, सद्भाव और मानवता का संदेश फैलाना भी है। उम्र के इस पड़ाव पर लगातार पैदल चलकर लोगों के बीच पहुंचना उनके दृढ़ संकल्प और सेवाभाव को दर्शाता है। उनकी यात्रा उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है, जो समाज के लिए कुछ बेहतर करने की इच्छा रखते हैं। शहीद जवानों और हादसों में जान गंवाने वालों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना लक्ष्मण ने बताया कि उनकी यात्रा पुलवामा और कारगिल में शहीद हुए देश के वीर जवानों की आत्मा की शांति के लिए समर्पित है। इसके साथ ही कोरोना महामारी के दौरान जान गंवाने वाले लोगों, अहमदाबाद विमान हादसे के मृतकों और इंदौर में जहरीला पानी पीने से हुई मौतों के पीड़ितों को भी उन्होंने अपनी प्रार्थनाओं में शामिल किया है। उनका कहना है कि देश-दुनिया में विभिन्न कारणों से असमय मृत्यु का शिकार हुए लोगों की आत्मा की शांति और उनके परिजनों के दुख को महसूस करते हुए उन्होंने यह संकल्प लिया है। उन्होंने बताया कि इस उद्देश्य से वे गया जी पहुंचे, जहां मृतकों का पिंडदान किया। इसके बाद बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन कर विश्व शांति और मृतकों की आत्मा की तृप्ति के लिए प्रार्थना की। धार्मिक आस्था के साथ मानवता को जोड़ने वाली उनकी यह पहल लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। लक्ष्मण का मानना है कि किसी भी धर्म और समुदाय का व्यक्ति हो, मानव जीवन का सम्मान और दूसरों के दुख में सहभागी बनना सबसे महत्वपूर्ण है। मूक-बधिर, नेत्रहीन और दिव्यांगों की सेवा भी है उद्देश्य लक्ष्मण की यह यात्रा केवल मृतकों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना तक सीमित नहीं है। वे मूक-बधिर, नेत्रहीन, दिव्यांग और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों की सहायता के लिए भी काम करते हैं। जरूरतमंदों की मदद के लिए लोगों से सहयोग जुटाते हैं और आपदा के समय चंदा इकट्ठा कर जिला प्रशासन को सौंपते हैं, ताकि प्रभावित लोगों तक सहायता पहुंच सके। लक्ष्मण का कहना है कि जीवन का वास्तविक अर्थ केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के काम आने में है। उन्होंने कहा, “अपने लिए जिया तो क्या जिया, दूसरों के लिए जीना ही सच्चा जीवन है।” यही विचार उनकी लंबी पैदल यात्रा और सामाजिक कार्यों की प्रेरणा बना हुआ है। औरंगाबाद पहुंचने पर स्थानीय लोगों ने उनके सेवाभाव और संकल्प की प्रशंसा की। लोगों का कहना था कि 71 वर्ष की उम्र में हजारों किलोमीटर पैदल चलकर शांति और एकता का संदेश देना अपने आप में बड़ी बात है। लक्ष्मण की यात्रा यह संदेश देती है कि मानवता, करुणा और आपसी सद्भाव के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बनती। उनका प्रयास समाज को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि जरूरतमंदों की सहायता और दूसरों के दुख में साथ देना ही सच्ची सेवा है।



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