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Rahul Gandhi Balaghat Visit | Jagla Village Adivasi Children Death Politics


सरकारी रिकॉर्ड में 32 मौतें दर्ज हैं जबकि कांग्रेस का दावा है कि 43 बैगा बच्चों की जान गई है।

मध्य प्रदेश के बालाघाट में बीमारियों की वजह से 32 बैगा आदिवासी बच्चों की मौत का मामला अब सियासी मुद्दा बन गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज बिरसा ब्लॉक के जगला गांव पहुंचकर इन बच्चों के परिजन से मुलाकात करेंगे। बीजेपी ने इस दौरे को राज

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राहुल के दौरे से पहले सरकारी रिकॉर्ड और जमीनी दावों में बड़ा अंतर सामने आया है। जगला के जिन चार मृत बच्चों के परिजन से वे मिलेंगे, उनके नाम प्रशासन के ऑफिशियल डेथ रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं। भास्कर की पिछली पड़ताल में भी सरकारी आंकड़ों से ज्यादा मौतों की जानकारी सामने आई थी।

बालाघाट में बच्चों की मौतों का सिलसिला मई में 3 साल की रूही परते की जान जाने के बाद शुरू हुआ था। मामला बढ़ने पर सरकार ने प्रभावित इलाकों में हेल्थ कैंप और स्क्रीनिंग शुरू की। सरकार का दावा है कि अब स्थिति नियंत्रण में है।

सोशल मीडिया पर भी सरकार को घेर चुके राहुल

राहुल गांधी इस मुद्दे पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर दो बार मोहन यादव सरकार पर सवाल उठा चुके हैं। 5 सितंबर को राहुल ने बच्चों की मौत के लिए पीने के पानी, पोषण और इलाज की कमी को जिम्मेदार बताते हुए इसे सरकार की विफलता कहा था। 17 सितंबर को उन्होंने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए लिखा था, ‘मुख्यमंत्री जी, दीये जलाने और उत्सव मनाने से फुर्सत मिल गई हो तो जरा राज्य की जमीनी हालत भी देखिए।’

जगला के 4 बच्चों की मौतें सरकारी रिकॉर्ड में नहीं

स्थानीय लोगों और परिजन के मुताबिक, जगला गांव के इन चार बच्चों की मौत सरकारी सूची में दर्ज नहीं हैं।

  1. अंकित धुर्वे (16 दिन): परिजन के मुताबिक 22 मई को पीलिया और बुखार से मौत; सरकारी रिकॉर्ड में नाम नहीं आया।
  2. नीलम: परिजन के मुताबिक 2 अगस्त को जिला अस्पताल में निमोनिया से मौत; सरकारी सूची में नाम नहीं है।
  3. सरस्वती धुर्वे (5 महीने): 30 अगस्त को मौत; रिकॉर्ड में नाम नहीं शामिल हुआ।
  4. बिसरू (1 महीना): 2 सितंबर को मौत; रिकॉर्ड में नाम नहीं। इसके अलावा पास के लू टोला की 15 दिन की सरिता की मौत भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है।

डिप्टी सीएम बोले- तब संवेदना दिखानी चाहिए थी

राहुल गांधी के दौरे पर उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने कहा, ‘राहुल गांधी केवल राजनीतिक माइलेज लेने का प्रयास कर रहे हैं। जब कठिन परिस्थितियां थीं, तब उन्हें संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी। जिन समस्याओं को कांग्रेस की नीतियों से बढ़ावा मिला, आज वही संवेदना की बात कर रहे हैं।’

सरकारी आंकड़ों और विपक्ष के दावों में बड़ा अंतर

बालाघाट में बच्चों की मौत के आंकड़ों को लेकर सरकारी रिकॉर्ड और विपक्ष के दावों में अंतर है। सरकारी रिकॉर्ड में बीमारी से अब तक 32 मौतें दर्ज हैं जबकि कांग्रेस विधायक संजय उइके का दावा है कि 43 बैगा बच्चों की जान गई है।

अगस्त में दैनिक भास्कर की टीम ने प्रभावित गांवों का दौरा किया था। उस समय प्रशासन 8 मौतों की बात कर रहा था। टीम ने बिरसा ब्लॉक के 9 गांवों में 20 बच्चों की मौत की जानकारी जुटाई थी। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को भी इन मौतों की जानकारी होने की बात सामने आई थी।

मौतों का सिलसिला कब और कैसे शुरू हुआ?

प्रशासन की आखिरी सूची के अनुसार, पहली मौत 18 मई 2026 को 3 साल की रूही परते की हुई। अगले दिन 19 मई को उसके 5 साल के भाई राम परते की भी जान चली गई। दोनों की मौत घर पर ही हुई थी।

परिजन के मुताबिक, उन्हें 15-20 दिन से तेज बुखार, मुंह में छाले और डिहाइड्रेशन की समस्या थी। इसके बाद भी मौतें दर्ज होती रहीं। 29 जुलाई को मीडिया में मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने कार्रवाई तेज की।

मामले के तूल पकड़ने के बाद स्वास्थ्य टीमें प्रभावित गांवों में पहुंचीं।

मामले के तूल पकड़ने के बाद स्वास्थ्य टीमें प्रभावित गांवों में पहुंचीं।

नाले के पानी के सैंपल में एडिनोवायरस मिला

बच्चों की मौत के बाद दिल्ली की NCDC, जबलपुर की NSCB, पुणे की NIV और ICMR की टीमों ने जांच की। रिपोर्ट में ये नतीजे सामने आए।

  • मीजल्स (खसरा): 101 सैंपल में 32 पॉजिटिव मिले।
  • मलेरिया: 64 सैंपल में 50 पॉजिटिव मिले।
  • डेंगू-चिकनगुनिया: डेंगू के 2 और चिकनगुनिया का 1 सैंपल पॉजिटिव मिला।
  • पानी के सैंपल: पुणे और कोलकाता भेजे गए 14 सैंपल में 5 पॉजिटिव मिले। नाले के पानी में एडिनोवायरस पाया गया।
बिरसा ब्लॉक में बच्चों की मौत की वजह नाले के पानी को भी कहा जा रहा है।

बिरसा ब्लॉक में बच्चों की मौत की वजह नाले के पानी को भी कहा जा रहा है।

बड़ा सवाल- पोस्टमॉर्टम के बिना मौत की वजह कैसे तय हुई?

सीएमएचओ डॉ. शत्रुघ्न सिंह दाहिया के मुताबिक, मौतों को सिर्फ मीजल्स से नहीं जोड़ा जा सकता। मलेरिया, उल्टी-दस्त और कुपोषण भी संभावित कारण हैं। उन्होंने बताया कि किसी मृत बच्चे का पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ है।

अब परिजन और ग्रामीणों से चर्चा के आधार पर ‘वर्बल ऑटोप्सी’ तैयार की जाएगी। ऐसे में सवाल है कि मौतों की वजह अब तक किस आधार पर तय की गई?

प्रशासनिक अधिकारियों ने घर-घर जाकर सर्वे किया।

प्रशासनिक अधिकारियों ने घर-घर जाकर सर्वे किया।

सरकार ने शुरू किए राहत और स्वास्थ्य संबंधी उपाय

सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में राहत और स्वास्थ्य संबंधी कार्य शुरू किए हैं।

  • जांच और इलाज: 57 गांवों में 43 हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग हुई। 6,537 लोगों का घर पर इलाज किया गया और 647 गंभीर बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
  • टीकाकरण: बिरसा ब्लॉक के 35,827 बच्चों को खसरा-रूबेला का टीका लगाया गया।
  • बजट और मुआवजा: उप स्वास्थ्य केंद्रों के लिए ₹1.93 करोड़ और उपकरणों के लिए ₹24 लाख दिए गए। पीड़ित परिवारों को ₹4-4 लाख मुआवजा दिया गया।
  • 14 नए स्वास्थ्य केंद्र स्वीकृत: दो नए पीएचसी, 2 सीएचसी और 10 उप स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए गए हैं। एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 30 बेड के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बदला गया।
  • आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की नियुक्ति: हर घर और हर बच्चे तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए 4 नए सीडीओपी और 52 अतिरिक्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता-सहायिकाओं की पदस्थापना की गई है।

कार्रवाई पर सवाल- बड़े अफसरों की जवाबदेही क्या तय हुई?

सरकार ने जिला मलेरिया अधिकारी का ट्रांसफर किया और सीएमएचओ से अतिरिक्त प्रभार वापस लिया। बाद में सीएमएचओ को पद से भी हटा दिया गया। अब सवाल जवाबदेही का है कि इतनी मौतों के मामले में जिम्मेदारी किस स्तर पर तय हुई और आगे क्या कार्रवाई होगी?

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