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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र से पूछा कि दवाओं की MRP, रिटेलर कीमत से 16% से ज्यादा क्यों होनी चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच दवाओं की कीमत, जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन और मेडिकल डिवाइस के नियंत्रण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। बेंच ने कहा कि करीब 3,000 रुपए की रिटेलर कीमत वाली कैंसर दवा की MRP लगभग 27,000 रुपए है। कोर्ट ने दवाओं पर एक समान नियम लागू करने की संभावना पर सवाल उठाया। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी। याचिकाओं में दवाओं की कीमतों में भारी अंतर से मरीजों और सरकारी योजनाओं पर पड़ने वाले बोझ का मुद्दा उठाया गया है। कैंसर दवा की कीमत पर सवाल जस्टिस संदीप मेहता ने कीमतों में बड़े अंतर को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “बस इस बड़े अंतर को देखिए।” उन्होंने पिछली सुनवाइयों में उठाई गई चिंताओं का भी जिक्र किया। इनमें दवाओं पर दस गुना या उससे ज्यादा मुनाफे का आरोप शामिल है। बेंच ने दवाओं के मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO), 2013 के तहत जरूरी और गैर-जरूरी दवाओं के बीच अंतर पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि कॉरपोरेट अस्पताल अक्सर मरीजों को अपनी इन-हाउस फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए कहते हैं। आयुष्मान भारत या अन्य सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में इलाज होने पर इसका बढ़ा हुआ खर्च आखिरकार करदाताओं को उठाना पड़ता है। कोर्ट ने 16% की समान सीमा पर पूछा बेंच ने कहा, “16% की समान सीमा क्यों नहीं होनी चाहिए? इसके आगे कुछ नहीं।” कोर्ट ने यह भी पूछा, “हर मेडिकल डिवाइस और हर दवा आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में आती है। अगर यह जरूरी चीज है, तो क्या इसे DPCO से बाहर रखा जा सकता है?” केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माना कि यह गंभीर मुद्दा है। उन्होंने कहा कि संतुलित समाधान तलाशना होगा। उन्होंने कहा, “मैं यह नहीं कह रहा कि याचिकाकर्ता गलत हैं। लेकिन ऐसा रास्ता खोजना होगा, जिसमें सभी पक्षों के हितों का संतुलन बने। मेरी समझ के अनुसार, इसका फायदा फार्मा कंपनियों को नहीं मिल रहा है।” गैर-सूचीबद्ध दवाओं की कीमत पर याचिकाकर्ताओं की दलील याचिकाओं में कहा गया है कि शेड्यूल्ड दवाएं बाजार का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा हैं। इन दवाओं पर कीमत की अधिकतम सीमा तय होती है। वहीं, गैर-सूचीबद्ध फॉर्मूलेशन संख्या और कीमत, दोनों के आधार पर बाजार का करीब 80% या उससे ज्यादा हिस्सा हैं। इनके शुरुआती MRP तय करने में निर्माताओं को ज्यादा छूट मिलती है। इन दवाओं की कीमतों में सालाना बढ़ोतरी मुख्य रूप से 10% तक सीमित रहती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे दवाओं पर बहुत ज्यादा मुनाफा जोड़ने की गुंजाइश बनती है। याचिकाओं में कहा गया है कि इलाज का खर्च उठाने के लिए कई मरीज अपनी संपत्ति या गहने तक बेच देते हैं। सरकारी योजनाओं के तहत भुगतान होने पर सरकारी धन पर भी बोझ पड़ता है। पिछली सुनवाई में कोर्ट की कड़ी टिप्पणी इसी बेंच ने पिछले हफ्ते दवाओं की कीमतों में ऐसे अंतर को “दिनदहाड़े डकैती”, “वसूली” और मरीजों के खिलाफ “पूरी तरह की अराजकता और तबाही” बताया था। बेंच ने नियामक संस्थाओं की चुप्पी पर भी सवाल उठाया था। इन याचिकाओं में अधिवक्ता किशन चंद जैन और अन्य की याचिकाएं शामिल हैं।
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₹3000 वाली कैंसर दवाई ₹27 हजार में क्यों बेच रहे:सुप्रीम कोर्ट का दवाओं की MRP पर सरकार से सवालरिटेलर कीमत से 16% से ज्यादा दाम
