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गोपालगंज शहर में करीब चार करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया अत्याधुनिक विद्युत शवदाह गृह तैयार होने के एक साल बाद भी उपयोग में नहीं आ रहा है। चिराई घर के पास बने इस मुक्तिधाम में विद्युत के साथ लकड़ी से दाह संस्कार की भी व्यवस्था है। परिसर में प्रतीक्षालय, पेयजल और बैठने समेत कई सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन यहां ताला लगा रहता है। सड़क किनारे और खुले में अंतिम संस्कार की मजबूरी स्थानीय लोगों के अनुसार, शवदाह गृह के उपयोग में नहीं आने के कारण लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार सड़क किनारे, खाली खेतों और गंडक नहर तुरकाहा के आसपास खुले में करने को मजबूर हैं। बारिश के दौरान परेशानी और बढ़ जाती है। लकड़ी की व्यवस्था करने से लेकर अंतिम संस्कार पूरा करने तक लोगों को दिक्कत होती है। स्थानीय निवासी मुन्ना चौधरी ने बताया कि परिसर में प्रतीक्षालय, पेयजल और बैठने की व्यवस्था समेत कई सुविधाएं करीब एक साल से बनी हुई हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि आसपास से स्कूल के बच्चे, अभिभावक और आम लोग गुजरते हैं। खुले में शव जलते देखकर बच्चे डर जाते हैं। जब शवदाह गृह बनकर तैयार है तो इसका इस्तेमाल होना चाहिए। विद्युत के साथ लकड़ी से दाह संस्कार की व्यवस्था शवदाह गृह में एक विद्युत बेड और पारंपरिक तरीके से दाह संस्कार के लिए दो लकड़ी वाले बेड बनाए गए हैं। परिसर में वेटिंग हॉल, पेयजल और बैठने की व्यवस्था भी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपए खर्च कर तैयार की गई सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं होने से उपकरण और परिसर बेकार पड़े हैं। नगर परिषद का दावा- दो कर्मी रहते हैं तैनात नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी ने बताया कि शवदाह गृह के लिए दो स्टाफ की नियमित तैनाती है। दाह संस्कार की व्यवस्था पूरी तरह नि:शुल्क है। नगर परिषद की ओर से माइकिंग और होर्डिंग-बैनर के माध्यम से लोगों को इसकी जानकारी भी दी गई है। समय-समय पर परिसर की सफाई कराई जाती है। उन्होंने बताया कि अब तक यहां एक भी शव का दाह संस्कार नहीं हुआ है। उनके अनुसार, लोग इसके बगल में ही खुले में अंतिम संस्कार करते हैं। नगर परिषद की ओर से प्रयास किए जाने के बावजूद लोग शवदाह गृह का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। कार्यपालक पदाधिकारी ने इसकी वजह स्थानीय लोगों के अनुसार शवदाह गृह की बनावट का पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुरूप नहीं होना बताया है।
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गोपालगंज में 4 करोड़ का विद्युत शवदाह गृह बनकर तैयार:एक साल से ताला लगा; लोग अब भी खुले में कर रहे अंतिम संस्कार
