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गंडक नदी में 4.5 लाख क्यूसेक से ज्यादा पानी छोड़ा:वाल्मीकि नगर बैराज से पानी छोड़ने के बाद निचले इलाकों में बढ़ी परेशानी




गोपालगंज में गंडक नदी के जलस्तर में हुई अचानक और अप्रत्याशित वृद्धि ने एक बार फिर विनाशकारी तबाही का संकेत दे दिया है। वाल्मीकिनगर बैराज से साढ़े चार लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़े जाने के कारण गंडक नदी रौद्र रूप धारण कर चुकी है। इस भयावह स्थिति से दियारा और निचले इलाकों में रहने वाले हजारों परिवारों के बीच भारी दहशत और अफरा-तफरी का माहौल है। नदी की तेज धारा और उफान को देखकर लोग गहरे भय में हैं और अनहोनी की आशंका से पूरी-पूरी रात जागकर अपने और अपने परिवार की रखवाली करने को मजबूर हैं। ”सुध लेने कभी समय पर नहीं पहुंचता शासन प्रशासन” दियारा इलाके के लोग के लिए बाढ़ कोई नई आपदा नहीं है; यह हर साल उनकी जिंदगी में तबाही की पटकथा लेकर आती है। इसके बावजूद, आपदा प्रबंधन और जनसुरक्षा के नाम पर शासन-प्रशासन का रवैया हमेशा की तरह उदासीन बना हुआ है। निचले इलाके में रहने वाले ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि हर साल बाढ़ उनके पक्के-कच्चे आशियाने, उपजाऊ जमीन और लहलहाती फसलें लील जाती है, लेकिन शासन प्रशासन उनकी सुध लेने कभी समय पर नहीं पहुंचता। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले जनप्रतिनिधि और अधिकारी इस विकट परिस्थिति में पूरी तरह मूकदर्शक बने रहते है। “हम जाएं तो आखिर कहां जाएं?” आपदा के समय जिला प्रशासन केवल कागजी खानापूरी करते हुए चेतावनी जारी कर देता है कि लोग सुरक्षित या ऊंचे स्थानों पर चले जाएं। इस पर ग्रामीणों का तीखा सवाल है “हम जाएं तो आखिर कहां जाएं?” क्षेत्र में न तो कोई स्थायी आपदा राहत केंद्र है और न ही कोई पक्का शरणस्थल। अपने छोटे-छोटे बच्चों, बीमार बुजुर्गों, भूखे मवेशियों और गृहस्थी के बचे-खुचे सामान के साथ खुले आसमान के नीचे या सड़कों के किनारे तिरपाल तानकर रहने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता। किसानों को भारी आर्थिक क्षति निचले इलाकों के निवासियों का दर्द और बेबसी उनके बयानों में साफ़ झलकती है। रात के अंधेरे में गंडक का पानी कब गांवों को अपनी चपेट में ले ले और सब कुछ बहा ले जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि वे हर पल मौत के साए में जीने को मजबूर हैं। सरकारी उदासीनता से आहत होकर एक महिला उषा देवी ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, “सरकार को हमारी लाचारी से कोई मतलब नहीं है, हम जिएं या मरें, प्रशासन के लिए हम सिर्फ एक संख्या हैं।” हम मरे या दिए उनको क्या मतलब है। जलप्रलय ने न केवल लोगों के रहने का ठिकाना छीन लेता है, बल्कि उनकी आजीविका की रीढ़ भी तोड़ देती है। खेतों में खड़ी फसलें पूरी तरह डूबकर बर्बाद हो जाती हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक क्षति पहुंचती है। जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर इसके साथ ही, बेजुबान मवेशियों के लिए चारे और शुद्ध पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है। जब भी नदी का जलस्तर बढ़ता है, दियारा के लोग अपनी जान, माल और आजीविका को बचाने के लिए शासन के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी किस्मत के सहारे संघर्ष करने पर मजबूर हो जाते हैं। नेपाल के तराई इलाकों में हो रही लगातार भारी बारिश के कारण गंडक नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंच गया है। वाल्मीकिनगर बराज से अचानक 4.16 लाख क्यूसेक पानी डिस्चार्ज किए जाने के बाद जिले में बाढ़ का खतरा मंडराने लगा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन पूरी तरह से अलर्ट मोड़ में आ गया है। लाउडस्पीकर के जरिए लगातार माइकिंग तटीय और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए प्रशासन द्वारा व्यापक स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। सदर एसडीएम डॉ. प्रेरणा सिंह एवं सदर सीओ रजत कुमार बरनवाल स्वयं मैदान में उतरकर मोर्चा संभाले हुए हैं। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा गंडक नदी के निचले और कैचमेंट इलाकों में लाउडस्पीकर के जरिए लगातार माइकिंग कराई जा रही है, ताकि आम जनमानस को समय रहते सतर्क किया जा सके। अधिकारियों ने निचले इलाकों के निवासियों से अपील की है कि वे पानी का बहाव तेज होने से पहले अपने-अपने घरों को छोड़कर ऊंचे और सुरक्षित स्थानों या राहत शिविरों में शरण लें।



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