2 घंटे पहले
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अभी गणेश उत्सव चल रहा है। गणेश पूजा का यह उत्सव 25 सितंबर तक चलेगा। इन दिनों में भगवान गणपति के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने का महत्व काफी अधिक है। भगवान विष्णु की तरह ही गणेश जी ने अधर्म का नाश करने के लिए समय-समय पर विकट, महोदर, विघ्नेश्वर जैसे अलग-अलग अवतार लिए हैं। इन अवतारों की पूजा से हमारे कई दोषों दूर हो सकते हैं। इन दोषों में काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या, मोह, अहंकार और अज्ञान शामिल है। जानिए गणपति जी का कौन सा अवतार किस असुर को खत्म करने के लिए प्रकट हुआ था…
वक्रतुंड गणेश दूर करते हैं ईर्ष्या की भावना
दैत्यगुरु शुक्राचार्य के कहने पर मत्सरासुर ने देवताओं को पराजित कर दिया था। मत्सरासुर के दो पुत्र थे सुंदरप्रिय और विषयप्रिय। ये दोनों भी अत्याचारी थे। इनके आतंक को खत्म करने के लिए वक्रतुंड प्रकट हुए। वक्रतुंड यानी टेड़ी सूंड वाले गणेश। भगवान वक्रतुंड ने मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का वध कर दिया और मत्सरासुर को भी पराजित कर दिया। इसके बाद मत्सरासुर गणेश जी का भक्त बन गया था।
मत्सर यानी ईर्ष्या, जलन की भावना। गणेश जी के इस स्वरूप की पूजा करने से हमारे मन से ईर्ष्या की भावना दूर हो सकती है।
नशे से बचने के लिए भक्त करते हैं एकदंत गणेश की पूजा
मदासुर नाम के असुर ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। इसके बाद मदासुर ने सभी देवताओं को पराजित कर दिया। देवताओं ने मदासुर के आतंक को खत्म करने के लिए गणेश जी से मदद मांगी थी। भगवान गणेश ने देवताओं की रक्षा करने के लिए एकदंत स्वरूप में अवतार लिया। एकदंत यानी एक दांत वाले गणेश। एकदंत गणेश ने मदासुर को खत्म किया।
मदासुर यानी मद, नशा। गणेश जी की सच्ची भक्ति करने से नशा करने की बुराई दूर हो सकती है।
मोह से बचाते हैं महोदर गणेश
कार्तिकेय स्वामी ने तारकासुर का वध कर दिया था, इसके बाद मोहासुर नाम के असुर ने देवताओं की परेशानियां बढ़ा दीं। तब देवताओं की प्रार्थना के बाद गणेश जी ने महोदर अवतार लिया। महोदर यानी बड़े पेट वाले गणेश। महोदर गणेश को देखते ही मोहासुर भगवान का भक्त बन गया।
मोहासुर यानी मोह। गणेश जी की पूजा से हमारे सभी मोह दूर हो सकते हैं।
कामभावना दूर करते हैं विकट गणेश
कामासुर नाम के असुर ने शिव जी से वरदान पाकर देवताओं को पराजित किया और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। तब देवताओं की रक्षा के लिए गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट यानी सभी परेशानियों को दूर करने वाले गणेश। भगवान विकट ने कामासुर को पराजित कर दिया।
कामासुर यानी कामभावना। गणेश जी पूजा से भक्त के मन से कामवासना की भावनाएं दूर हो सकती हैं।
लालच से बचाते हैं गजानन
देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के लालच की वजह से लोभासुर नाम का असुर प्रकट हुआ। उसने शुक्राचार्य की दीक्षा ली। शुक्राचार्य की आज्ञा से उसने शिव जी को प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिया। इसके बाद लोभासुर ने तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया था। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान गणेश ने गजानन रूप में अवतार लिया। गजानन यानी हाथी के जैसे मुख वाले गणेश। गजानन के स्वरूप को देखकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।
लोभासुर यानी लालच। जो लोग गणेश जी की नि:स्वार्थ भाव से भक्ति करते हैं, उनके मन से लालच दूर रहता है।
गुस्सा काबू करना हो, तो लंबोदर गणेश की पूजा करें
क्रोधासुर नाम के असुर को सूर्यदेव से वरदान मिला था। उसने देवताओं को पराजित कर दिया, इसके बाद सभी देवता उससे बचने के लिए गणेश जी के पास पहुंचे। तब देवताओं की रक्षा के लिए गणपति जी ने लंबोदर रूप में अवतार लिया। लंबोदर यानी लंबे और बड़े पेट वाले गणेश। लंबोदर गणेश से डरकर क्रोधासुर पाताल लोक में चला गया और देवताओं को उससे मुक्ति मिल गई।
क्रोधासुर यानी गुस्सा। गणेश जी की भक्ति से मन शांत रहता है और मन शांत हो, तो गुस्से जैसी बुराई पर काबू किया जा सकता है।
घमंड से बचाते हैं धूम्रवर्ण गणेश
पौराणिक कथा है कि एक बार सूर्य देव की छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। अहम का एक नाम अहंतासुर भी था। शुक्राचार्य की आज्ञा से उसने तीनों लोकों में बहुत अत्याचार किया। अहंतासुर के अंत के लिए गणेश जी ने धूम्रवर्ण अवतार लिया था। धूम्रवर्ण यानी धूएं के समान रंग वाले गणेश। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर को पराजित कर दिया। बाद में वह भी गणेश जी का भक्त बन गया।
अहंतासुर यानी अहंकार। गणेश जी की पूजा से हमारी मन से अहंकार की भावना दूर होती है।

