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उत्तराखंड की आराध्य देवी नंदा की बड़ी जात आज चमोली के सिद्धपीठ कुरुड़ से शुरू हो रही है। करीब 280 किमी की यह उच्च हिमालयी यात्रा 20 दिन तक चलेगी। यात्रा के लिए बीते कई दिनों से तैयारियां चल रही हैं और देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंच चुके हैं। हिमालयी कुंभ कहे जाने वाले इस आयोजन को लेकर लोगों में उत्सुकता है, लेकिन इस बार की यात्रा ने कुरुड़ और नौटी के लोगों को दो धड़ों में बांट दिया है। नौटी के लोग पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि नंदा देवी की राजजात यात्रा 2027 में निकाली जाएगी, जबकि कुरुड़ पक्ष इसी साल बड़ी जात निकाल रहा है। इसी के चलते इस बार कुरुड़ से निकलने वाली तीन प्रमुख डोलियों में से भी एक को बड़ी जात का हिस्सा नहीं माना जा रहा। वह लोक जात के रूप में चलेगी और उसका अंतिम पड़ाव होमकुंड नहीं होगा। वाण गांव इस यात्रा का बेहद अहम पड़ाव है। परंपरा के मुताबिक यहां नंदा अपने धर्मभाई लाटू देवता से मिलती है और फिर यहीं से आगे की हिमालयी यात्रा की महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ती है। लेकिन इस बार वाण गांव में भी डोलियों के प्रवेश को लेकर असमंजस्य की स्थिति है। आखिर नौटी और कुरुड़ के बीच विवाद क्यों हुआ, वाण में ऐसी स्थिति क्यों बनी और तीन डोलियों में से एक होमकुंड क्यों नहीं जाएगी- पूरी कहानी समझिए। तीन डोलियां, लेकिन यात्रा और पक्ष अलग-अलग कुरुड़ के सिद्धपीठ मंदिर और अपने मायके से इस बार नंदा देवी की तीन डोलियां निकल रही हैं। बंड और दसौली पट्टी की डोलियां होमकुंड तक जाएंगी। वहीं, बधाण की डोली इस बार बड़ी जात में शामिल नहीं है। नौटी पक्ष ने 2027 में राजजात कराने का ऐलान किया है। नौटी बधाण पट्टी में ही आता है, इसलिए बधाण की डोली इस बार लोक जात के रूप में अपने तय रूट पर जाएगी। वाण पहुंचने पर तीनों डोलियों को लेकर स्थिति साफ होगी। बधाण की डोली को वाण में प्रवेश मिलने की उम्मीद है, लेकिन बंड और दसौली की डोलियों के लिए स्थिति मुश्किल है। वाण की ग्राम प्रधान नंदुली देवी ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर कुरुड़ समिति की डोलियों को गांव में प्रवेश नहीं देने की बात कही है। पत्र में कहा गया है कि गांव में डोलियों और श्रद्धालुओं के रहने-खाने की कोई व्यवस्था नहीं है। अगर इसके बावजूद कोई घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी समिति और प्रशासन की होगी। बधाण की डोली वाण से आगे गैरोली पाताल, वेदनी और फिर मेटा जाएगी। 25 सितंबर को मेटा में इसका अंतिम पड़ाव होगा। इसके बाद पूजा के लिए डोली सिद्धपीठ देवराड़ा पहुंचेगी, जहां नंदा देवी छह महीने रहेंगी। बंड और दसौली की डोलियां वाण से आगे होमकुंड की ओर जाएंगी। वाण में प्रवेश को लेकर विवाद ने बढ़ाई चिंता चमोली का गांव वाण इस यात्रा में सबसे अहम पड़ावों में से एक है। परंपरा के मुताबिक यहां नंदा और लाटू का मिलन होता है। लाटू को नंदा देवी का धर्मभाई माना जाता है। पहले डोलियों के वाण पहुंचने पर गांव में ही रात के विश्राम की व्यवस्था होती थी। श्रद्धालुओं के रहने और खाने-पीने का इंतजाम भी गांव की ओर से किया जाता था। इस बार वाण की ग्राम प्रधान नंदुली देवी ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर कुरुड़ समिति की डोलियों को गांव में प्रवेश न देने की बात कही है। अब सवाल यह है कि ग्राम प्रधान की इस रोक के बाद क्या दसौली और बंड की डोलियां वाण गांव में प्रवेश कर पौराणिक लाटू मंदिर तक जाएंगी? क्योंकि परंपरा में वाण नंदा-लाटू मिलन का महत्वपूर्ण पड़ाव है। ऐसे में प्रधान के पत्र के बाद डोलियों और श्रद्धालुओं के वहां पहुंचने पर क्या स्थिति बनेगी, यह अभी बड़ा सवाल है।” अब दोनों मुख्य डोलियों का रूट जानिए… देवी के साथ आठ महीने का खाड़ू भी लेगा विदाई इस बार करीब आठ महीने का चौसिंग्या खाड़ू सुंग गांव से यात्रा की अगुवाई करेगा। खास बात यह है कि सुंग गांव से दूसरी बार चौसिंग्या खाड़ू बड़ी जात में शामिल हो रहा है। इसे 3 सितंबर को कुरुड़ पहुंचाया गया। अब यात्रा में इसके साथ अलग-अलग गांवों की देव डोलियां और छंतोलियां भी चलेंगी। मान्यता के अनुसार होमकुंड पहुंचने के बाद खाड़ू को भी नंदा देवी के साथ हिमालय की ओर विदा किया जाएगा। 5 पॉइंट्स में समझिए, कुरुड़-नौटी विवाद की जड़ क्या है…. नौटी समिति ने राजजात क्यों स्थगित की? नौटी की श्री नंदा देवी राजजात समिति ही 2026 की राजजात यात्रा की तैयारी करा रही थी। समिति ने जनवरी में 2026 का आयोजन स्थगित करने का फैसला लिया। समिति का कहना था कि इस बार मलमास के कारण यात्रा का हिमालयी चरण सितंबर के दूसरे पखवाड़े में पहुंच रहा है। 20 सितंबर के आसपास ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यात्रा होने से बर्फबारी, ओलावृष्टि और बारिश का खतरा रहेगा। समिति ने यह भी कहा कि होमकुंड समेत ऊंचाई वाले निर्जन इलाकों में यात्रियों के लिए जरूरी ढांचागत सुविधाओं का काम पूरा नहीं हुआ है। ऐसे में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को लेकर यात्रा कराना सुरक्षित नहीं होगा। चमोली प्रशासन की ओर से भी समिति को यात्रा की परिस्थितियों पर पुनर्विचार करने के लिए पत्र दिया गया था। समिति ने यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए 2026 की यात्रा को टालकर 2027 में कराने का फैसला किया। राजजात में नौटी और कांसुवा के राज कुंवर की भूमिका क्या है? नंदा देवी की इस परंपरा में नौटी के नौटियाल ब्राह्मण और कांसुवा के राजकुंवर की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। मान्यता के अनुसार नंदा देवी की जात की परंपरा गढ़वाल के राजपरिवार से जुड़ी रही है। बाद में आयोजन की जिम्मेदारी कांसुवा के राजकुंवरों को सौंपी गई। कुछ मान्यताओं के अनुसार राजा भानुप्रताप के समय नंदा जात के आयोजन का भार कांसुवा के राजकुंवरों को दिया गया, जिसके बाद वे राजा के प्रतिनिधि के तौर पर इस परंपरा से जुड़े रहे। वहीं नौटी के नौटियाल ब्राह्मण राजगुरु और धार्मिक अनुष्ठानों की जिम्मेदारी निभाते रहे। परंपरा में कांसुवा के राजकुंवर मनौती की रिंगाल की छंतोली और चौसिंग्या खाड़ू लेकर नौटी पहुंचते हैं। यहां नौटियाल ब्राह्मणों की मौजूदगी में पूजा-अनुष्ठान होते हैं और आगे की यात्रा से जुड़ी धार्मिक प्रक्रिया पूरी की जाती है। इस तरह कांसुवा के राजकुंवर राजा के प्रतिनिधि और नौटी के नौटियाल ब्राह्मण धार्मिक पक्ष के प्रमुख कर्ताधर्ता माने जाते हैं। इसी व्यवस्था के तहत 2026 की राजजात की तैयारी नौटी की समिति कर रही थी और कांसुवा के राज कुंवरों ने इसी परंपरा के तहत मनौती की। बाद में नौटी पक्ष ने राजजात 2027 में कराने का फैसला किया। दूसरी ओर कुरुड़ पक्ष ने 2026 में ही बड़ी जात निकालने का निर्णय लिया। इसलिए इस बार सवाल सिर्फ यात्रा की तारीख का नहीं, बल्कि कुरुड़ की भूमिका और नौटी-कांसुवा से चली आ रही राजजात की व्यवस्था का भी है। 12 साल का चक्र, लेकिन हर बार 12 साल बाद ही यात्रा नहीं हुई नंदा देवी की राजजात को आम तौर पर 12 साल के अंतराल से जोड़ा जाता है, लेकिन हर बार यात्रा ठीक 12 साल बाद ही हुई हो, ऐसा नहीं है। 1968 के बाद 1987 में यात्रा हुई। इसके बाद 2000 में आयोजन हुआ। 2012 में यात्रा प्रस्तावित थी, लेकिन 2013 की आपदा के कारण इसे टालना पड़ा और बाद में 2014 में यात्रा हुई। इसी पुराने क्रम को देखते हुए इस बार 2026 में यात्रा को लेकर विवाद खड़ा हुआ। नौटी पक्ष ने मौसम और तैयारियों को देखते हुए राजजात 2027 में कराने की बात कही। कुरुड़ पक्ष इससे सहमत नहीं हुआ और उसने 2026 में ही बड़ी जात निकालने का फैसला किया। यही वजह है कि इस बार 2026 की बड़ी जात और 2027 में प्रस्तावित राजजात को अलग-अलग देखा जा रहा है। अब 2026 की यात्रा शुरू हो चुकी है और आगे वाण, होमकुंड और देवराड़ा के पड़ावों पर क्या होता है, इस पर लोगों की नजर रहेगी।
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उत्तराखंड में आज निकलेगी नंदा देवी की 'बड़ी जात':12 साल बाद कैलाश जाएंगी मां, कुरुड़ से चलेंगी 3 डोलियां, एक नहीं पहुचेगी होमकुंड
