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गयाजी- मृत्युभोज पर रोक, शोकसभा से श्रद्धांजलि का संकल्प:दो पंचायत के गांव के लोगों ने लिया फैसला, कहा- अनावश्यक खर्च से बुजुर्गों, गरीबों की मदद करेंगे




बुजुर्गों के जीवित रहते उनकी सेवा और जरूरतमंदों की मदद के बजाय मृत्यु के बाद भोज पर लाखों रुपये खर्च करने की इस परंपरा को बदलने की पहल बाराचट्टी में शुरू हुई है। जयगीर और भलुआ पंचायत के ग्रामीणों ने मृत्यु भोज बंद करने का संकल्प लिया है। अब किसी की मृत्यु होने पर भोज के बजाय शोकसभा आयोजित की जाएगी। धार्मिक कर्मकांड परंपरा के अनुसार होंगे। लेकिन अनावश्यक खर्च की राशि बुजुर्गों की सेवा और गरीबों की मदद में लगाई जाएगी। ग्रामीणों की यह पहल सामाजिक बदलाव की नई राह खोल रही है। जून में शुरू हुई पहल, कई गांवों तक पहुंचा संदेश मृत्यु भोज बंद करने की शुरुआत जयगीर पंचायत में जून महीने में हुई थी। सोमिया गांव में ग्रामीणों की बैठक में सर्वसम्मति से इस परंपरा को खत्म करने का निर्णय लिया गया। पहल को आगे बढ़ाने के लिए बरंडी गांव के इंद्रदेव यादव को अध्यक्ष बनाया गया। इंद्रदेव यादव ने बताया कि अक्सर लोग अपने बुजुर्गों के जीवित रहते उनकी समुचित सेवा नहीं कर पाते हैं। लेकिन मृत्यु के बाद कर्मकांड और भोज पर लाखों रुपये खर्च कर देते हैं। इसी सोच को बदलने के लिए ग्रामीणों ने यह कदम उठाया है। निर्णय के बाद केवलिया, सोमिया, बरवाडीह और बरंडी समेत कई गांवों में मृत्यु होने पर भोज के बजाय शोकसभा आयोजित की गई। इसका असर मोहनपुर प्रखंड के गोपलकेड़ा समेत दूसरे गांवों में भी देखने को मिला। भगवान को साक्षी मानकर ली शपथ इसी कड़ी में भलुआ पंचायत के तेतरिया गांव में भी यादव समाज के लोगों ने मृत्यु भोज नहीं करने का संकल्प लिया। बाराचट्टी प्रमुख प्रतिनिधि जगदीश यादव के नेतृत्व में ग्रामीणों ने भगवान को साक्षी मानकर शपथ ली कि वे न तो अपने परिवार में मृत्यु होने पर भोज करेंगे और न ही दूसरे के यहां आयोजित मृत्यु भोज में शामिल होकर भोजन करेंगे। जगदीश यादव ने बताया कि गांव में यादव समाज के करीब 60 परिवार हैं। फिलहाल समाज के लोगों ने इस पहल की शुरुआत की है। उम्मीद है कि धीरे-धीरे दूसरे समाज के लोग भी इससे जुड़ेंगे। ग्रामीणों का मानना है कि मृत्यु भोज पर होने वाले खर्च को जरूरतमंदों की मदद में लगाना ही दिवंगत के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यह पहल केवल एक परंपरा को छोड़ने की नहीं, बल्कि समाज में सेवा और संवेदना को प्राथमिकता देने की कोशिश है।



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