लंदन4 मिनट पहले
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ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ग्लासगो में एक बैठक में शामिल होते हुए। तस्वीर 30 अक्टूबर 2026 की है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम के मुताबिक उनका देश अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर बेचने के लिए माफी मांगने पर विचार कर रहा है। बर्नहम ने शुक्रवार को ब्रिटिश अखबार ‘द गार्डियन’ में छपे एक लेख में यह लिखा। उन्होंने गुलामी से प्रभावित देशों को आर्थिक मुआवजा देने की मांग को खारिज कर दिया है।
ब्रिटेन करीब 400 साल तक अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर बेचता रहा। अब बर्नहम का कहना है कि ब्रिटेन इस मुद्दे पर गुलामी से प्रभावित देशों और संगठनों से बातचीत शुरू करेगा।
PM बोले- आज की पीढ़ी पुराने अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं
बर्नहम ने लिखा है कि आज के ब्रिटिश नागरिकों को उन गलतियों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जो सैकड़ों साल पहले हुई थीं। उस समय के अपराधों में आज के लोगों की कोई भूमिका नहीं थी।
उन्होंने लिखा कि ब्रिटेन इसके बजाय गरीब कॉमनवेल्थ देशों की कर्ज चुकाने में मदद कर सकता है। इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन की अगुआई में एक योजना शुरू करने की बात कही गई है। इसके तहत गरीब देशों को कर्ज चुकाने के लिए ज्यादा समय और कम ब्याज देने की कोशिश होगी। ब्रिटेन इन देशों को साफ ऊर्जा अपनाने में भी मदद करेगा।
32 लाख अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाया
ट्रांसअटलांटिक स्लेव ट्रेड डेटाबेस के मुताबिक, ब्रिटेन ने करीब 32 लाख अफ्रीकी लोगों को अटलांटिक पार ले जाकर गुलाम बनाया था। इस पूरे कारोबार में यूरोपीय देशों ने मिलकर 1.25 करोड़ से ज्यादा अफ्रीकी लोगों को पकड़कर गुलामी के लिए बेचा था।
ब्रिटेन ने 1807 में अपने साम्राज्य में गुलामों की खरीद-बिक्री पर रोक लगाई थी। इसके बाद 1833 में गुलामी खत्म करने का कानून बनाया गया। हालांकि, सभी गुलामों को पूरी आजादी मिलने में 1838 तक का समय लगा।
गुलामी खत्म करने के बाद ब्रिटेन ने पीड़ितों को नहीं, बल्कि उनके मालिकों को मुआवजा दिया था। सरकार ने गुलामों के मालिकों को 2 करोड़ पाउंड दिए थे। यह उस समय ब्रिटेन के सालाना सरकारी बजट का करीब 40% था। इस रकम के लिए सरकार ने जो कर्ज लिया था, उसे चुकाने में 2015 तक का समय लगा।
भारत से भी 20 लाख मजदूरों को काम के लिए विदेश भेजा गया
गुलामी खत्म होने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य में मजदूरों से तय समय तक काम कराने की व्यवस्था शुरू हुई। इसे इंडेंचर्ड लेबर सिस्टम कहा जाता था। इसके तहत 1838 से 1917 के बीच करीब 20 लाख भारतीय पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को ब्रिटिश उपनिवेशों में काम करने के लिए भेजा गया। इनमें कैरेबियाई देश और दक्षिण अफ्रीका भी शामिल थे।
इनमें से कई लोगों को नौकरी की असली शर्तें नहीं बताई गई थीं। कुछ लोगों को अगवा करके भी ले जाया गया। वहां उनसे खेतों और बागानों में काम कराया जाता था। कम मजदूरी और खराब हालात के कारण कई मजदूर भारत लौटने का खर्च भी नहीं उठा पाए।
ब्रिटेन के मैनचेस्टर, लिवरपूल और ग्लासगो जैसे शहरों की कपड़ा मिलों में भारत से भेजे गए कच्चे कपास का इस्तेमाल होता था। वहीं, भारत ब्रिटेन में बने कपड़ों का बड़ा बाजार बन गया था। इससे ब्रिटेन को फायदा हुआ, जबकि भारत के पारंपरिक कपड़ा उद्योग को नुकसान पहुंचा।
शशि थरूर बोले- भारत में हुए अत्याचारों के लिए भी माफी मांगे ब्रिटेन
कांग्रेस सांसद और लेखक शशि थरूर ने बर्नहम के बयान पर रिएक्शन दिया है। उन्होंने x पर लिखा कि ब्रिटेन को सिर्फ गुलामी के लिए नहीं, बल्कि भारत में किए गए अत्याचारों और लूट के लिए भी माफी मांगनी चाहिए।
थरूर ने ‘द हिंदू’ से कहा कि भारत में हुई लूट, तबाही और लोगों की मौतों के लिए ब्रिटेन का अब तक माफी नहीं मांगना शर्मनाक है। उन्होंने कहा कि भारत को हुए नुकसान की भरपाई के लिए कोई भी रकम काफी नहीं होगी, लेकिन ब्रिटेन को अपनी गलतियां स्वीकार करनी चाहिए।
थरूर पहले भी सुझाव दे चुके हैं कि ब्रिटेन भारत को 200 साल तक हर साल एक पाउंड का प्रतीकात्मक मुआवजा दे। उनका कहना है कि यह रकम से ज्यादा अपनी ऐतिहासिक गलतियों को स्वीकार करने का मामला है।
किंग चार्ल्स ने माना- अतीत में लोगों के साथ बहुत अन्याय हुआ
ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स इन दिनों कैरेबियाई देशों के दौरे पर हैं। कॉमनवेल्थ बैठक से पहले उन्होंने बहामास में कहा कि अतीत में लोगों को बहुत दुख झेलना पड़ा और उनके साथ अन्याय हुआ। हालांकि, उन्होंने इसके लिए औपचारिक माफी नहीं मांगी।
ब्रिटेन के बकिंघम पैलेस ने कहा है कि माफी मांगने का फैसला वहां की चुनी हुई सरकार को करना है।
बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली ने बर्नहम के बयान का स्वागत किया है। हालांकि, उन्होंने साफ कहा कि कैरेबियाई देश गुलामी के लिए आर्थिक मुआवजे की मांग जारी रखेंगे।
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