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क्या बायोलॉजिकल तौर पर पुरुष जन्मा व्यक्ति, सर्जरी करवाने के बाद महिला के लिए आरक्षित अधिकारों का दावा कर सकता है… इस सवाल को लेकर एक महिला संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने बायोलॉजिक मेल को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में महिला दर्ज करने की व्यवस्था को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता संगठन ‘विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया’ ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7और नियम 7 को चुनौती दी है। याचिका के मुताबिक, यह प्रावधान बायोलॉजिकल पुरुषों को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में खुद को ‘महिला’ के तौर पर दर्ज कराने की अनुमति देता है। याचिका में 2014 के NALSA जजमेंट पर भी पुनर्विचार की मांग की गई है, जिसमें ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी जेंडर पहचान की कानूनी मान्यता का अधिकार दिया गया था। 28 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान बेंच ने बताया – जन्म से पुरुष लेकिन महिला के रूप में पहचान रखने वाले ट्रांस व्यक्ति को बायोलॉजिकल महिला के समान दर्जा नहीं मिलना चाहिए। याचिकाकर्ता बोले- सर्जरी से जैविक क्रोमोसोम-जेनेटिक्स नहीं बदलते याचिकाकर्ता संगठन के मुताबिक, जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर जैविक महिलाओं के लिए बने संवैधानिक और कानूनी अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। मौजूदा व्यवस्था जेंडर आइडेंटिटी को जैविक सेक्स का आधार मानती है। इससे जन्म के समय पुरुष दर्ज व्यक्ति सरकारी दस्तावेजों में महिला पहचान हासिल कर सकते हैं। याचिका में दावा है कि इससे जैविक महिलाओं के लिए बने संवैधानिक और कानूनी संरक्षण तथा लाभ प्रभावित होते हैं। याचिका में कहा गया, “कोई भी मेडिकल या सर्जिकल प्रक्रिया, चाहे वह कितनी भी व्यापक हो, व्यक्ति के जैविक सेक्स, क्रोमोसोम या जेनेटिक्स को नहीं बदलती।” सुनवाई में क्या हुआ याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अमित सिबल पेश हुए। उन्होंने कहा कि यह याचिका खासतौर पर जैविक महिलाओं के अधिकारों की बात करती है। सिबल ने कहा कि ये लाभ बने रहने चाहिए और इनमें दखल नहीं होना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मुख्य याचिकाओं के समूह में जवाब तैयार किया जा रहा है। इस याचिका का जवाब भी उसी में शामिल किया जाएगा। इस स्थिति में उनका तर्क होगा कि मामला विधायिका पर छोड़ा जा सकता है। जस्टिस बागची ने कहा, विधायिका ने इस मुद्दे पर फैसला नहीं किया है। ट्रांस व्यक्ति बच्चे को जन्म नहीं दे सकता, लेकिन जैविक महिला बच्चे को जन्म दे सकती है। जस्टिस मोहना ने कहा कि ट्रांसजेंडर बच्चे को जन्म दे सकते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि महिला के रूप में पहचान रखने वाले ट्रांसजेंडर बच्चे को जन्म नहीं दे सकते। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि खुद को पुरुष या महिला मानना असली समस्या है। उन्होंने कहा कि जैविक पुरुष, जिसके शरीर में पुरुषों जैसी सभी शारीरिक विशेषताएं हैं, खुद को महिला बताकर खेल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का अधिकार मांग सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ अदालतों ने ऐसे मामलों में आदेश दिए हैं। इसके बाद जैविक पुरुष महिला खिलाड़ियों के साथ खेल सकता है और उसकी शारीरिक ताकत का असर पड़ सकता है। याचिका में 3 फैसलों का हवाला दिया याचिकाकर्ता ने महिला आरक्षण, सेक्स-विशेष पदों पर भर्ती, खेलों में भागीदारी और अलग-अलग जेंडर के लिए बने स्थानों के इस्तेमाल से जुड़े कई फैसलों और प्रशासनिक कदमों का हवाला दिया है।
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ट्रांसजेंडर एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका:महिला संगठन का सवाल- क्या सर्जरी करवाकर महिला बने पुरुष को महिलाओं के अधिकार मिलने चाहिए
