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भगवान गणेश का शरीर इतना विशाल है और उनका वाहन छोटा सा मूषक यानी चूहा है, यह बात भले ही विचित्र लगे, लेकिन इसके पीछे एक रोचक कथा और मनोवैज्ञानिक संदेश छिपा है। कथा सतयुग के समय की बताई जाती है। उस समय एक असुर मूषक यानी चूहे का रूप धारण करके पाराशर ऋषि के आश्रम में पहुंच गया। मूषक इतना उत्पात मचाने लगा कि आश्रम की सभी वस्तुओं को कुतर-कुतरकर नष्ट करने लगा। ऋषियों के लिए उसका आतंक परेशानी का कारण बन गया। अंततः सभी ऋषियों ने गणेश जी से प्रार्थना की कि वे इस मूषक के आतंक से आश्रम को मुक्त करें। ऋषियों की प्रार्थना सुनकर गणेश जी वहां प्रकट हुए। उन्होंने अपना पाश फेंका और मूषक को पकड़ लिया। बंदी बनाए जाने के बाद मूषक को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने गणेश जी से प्रार्थना की कि उसे मृत्यु दंड न दिया जाए। गणेश जी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उससे कहा कि वह कोई वर मांग सकता है। मूषक का स्वभाव कुतर्क करने वाला था। उसने कहा कि उसे कोई वर नहीं चाहिए, बल्कि गणेश जी आप ही मुझसे कोई वर मांग लीजिए। मूषक की इस बात पर गणेश जी मुस्कुराए और बोले- यदि तू मुझे कुछ देना ही चाहता है तो मेरा वाहन बन जा। मूषक गणेश जी की बात मान गया, लेकिन जैसे ही गणेश जी उसके ऊपर सवार हुए, भगवान के भार से मूषक दबने लगा। उसने फिर गणेशजी से प्रार्थना की कि आप मेरी शक्ति के अनुसार अपना भार कर लें। गणेश जी ने उसकी यह प्रार्थना भी स्वीकार की और अपना भार उसके अनुसार कर लिया। तभी से मूषक को गणेश जी का वाहन माना जाने लगा। इस कथा का मनोवैज्ञानिक पक्ष बेहद महत्वपूर्ण है। गणेश जी बुद्धि और विवेक के प्रतीक हैं, जबकि मूषक को कुतर्क, चंचलता और मन की लगातार दौड़ती प्रवृत्तियों का प्रतीक माना जा सकता है। मन में उठने वाले छोटे-छोटे संदेह, तर्क-वितर्क और अनावश्यक विचार यदि नियंत्रण से बाहर हो जाएं, तो वे जीवन की शांति को उसी तरह कुतर सकते हैं, जैसे कथा में मूषक ने आश्रम को कुतरा था। गणेश जी का मूषक पर सवार होना इस बात का प्रतीक माना जा सकता है कि बुद्धि और विवेक कुतर्क के साथ चंचल मन को नियंत्रित कर सकते हैं। विचारों को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें समझकर सही दिशा देना जरूरी है। प्रसंग की सीख मूषक छोटा है, लेकिन कथा में उसका उत्पात बड़ा है। जीवन में भी छोटी-सी चिंता, संदेह, ईर्ष्या या नकारात्मक सोच शुरुआत में मामूली लग सकती है, लेकिन यदि उस पर ध्यान न दिया जाए, तो वह धीरे-धीरे हमारी शांति और एकाग्रता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए समस्या छोटी हो, तो भी उसे पहचानना जरूरी है। हम अक्सर अपने निर्णयों को सही साबित करने के लिए तर्क खोजते हैं, लेकिन तर्क और कुतर्क में अंतर है। सही तर्क हमें समाधान तक ले जाता है, जबकि कुतर्क केवल बहस को लंबा करता है। किसी निर्णय से पहले खुद से पूछें- क्या मैं समाधान खोज रहा हूं या केवल अपनी बात सही साबित करना चाहता हूं? गणेश जी को बुद्धि और विवेक का प्रतीक माना जाता है। जीवन में बहुत कुछ जानना पर्याप्त नहीं है। उस ज्ञान का सही समय पर सही इस्तेमाल करना ही विवेक है। भावनाओं में बहकर कोई निर्णय लेने के बजाय कुछ क्षण रुककर परिस्थितियों को देखकर निर्णय लेना हमें कई गलतियों से बचा सकता है। मूषक को खत्म नहीं किया गया, बल्कि उसे वाहन बना लिया गया। इसे जीवन के लिए एक सुंदर रूपक की तरह देखा जा सकता है। हमारे भीतर भी डर, गुस्सा, बेचैनी और सवाल होते हैं। इन्हें पूरी तरह दबाने के बजाय समझकर सकारात्मक दिशा देना अधिक उपयोगी है। अपने विचारों को समझें और नकारात्मक छोड़कर उन्हें सही दिशा में आगे बढ़ाएं। जब मूषक गणेश जी का भार नहीं उठा पाया, तब उसने अपनी क्षमता के अनुसार भार रखने का अनुरोध किया। इससे एक व्यावहारिक सीख मिलती है- हर व्यक्ति की अपनी क्षमता होती है। अपनी सीमाओं को पहचानना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता है। हमें अपनी क्षमताओं के मुताबिक लक्ष्य का निर्धारण करना चाहिए। मूषक अपने कुतर्क से बचने की कोशिश करता है, लेकिन अंततः गणेश जी की बुद्धि के सामने उसे अपनी भूमिका बदलनी पड़ती है। जीवन में भी बहस जीतने से अधिक महत्वपूर्ण समस्या का समाधान करना है।
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गणेश उत्सव 25 सितंबर तक:क्या आप जानते हैं भगवान गणेश का वाहन मूषक कैसे बना? सफलता के सूत्र सिखाती है गणेश जी और मूषक की कथा
