Headlines

Himalaya Glacier Melting Report | ICIMOD Climate Change Impact Update


हिमालय के ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। पिछले 3 दशकों में बर्फ का बड़ा हिस्सा गायब हो चुका है और अब इसका असर सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है। ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव आने वाले समय में पानी की उपलब्धता और हिमालयी इलाकों में आपदा के खतरे को भी प्रभ

.

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की 1990 से 2020 तक के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट में सामने आया है कि पूरे हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 11.6% घट गया। खास बात ये है कि 2010 के बाद ग्लेशियरों के सिकुड़ने की रफ्तार और तेज हुई है। उत्तराखंड से जुड़े ऊपरी गंगा क्षेत्र में भी तीन दशक में ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 18.6% कम हुआ है।

हालांकि, कई इलाकों में ग्लेशियरों की संख्या बढ़ी है, लेकिन फिर भी बर्फ से ढका कुल क्षेत्रफल घट गया। आखिर ग्लेशियरों की संख्या बढ़कर भी उनका आकार क्यों घट रहा है, किन ऊंचाइयों पर सबसे ज्यादा बर्फ पिघली और उत्तराखंड के ग्लेशियरों की तस्वीर कितनी चिंताजनक है? जानने के लिए पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

रिपोर्ट में इस मैप के जरिए बताया गया है कि कहां कहां ग्लेशियरों की क्या स्थिति है।

रिपोर्ट में इस मैप के जरिए बताया गया है कि कहां कहां ग्लेशियरों की क्या स्थिति है।

2010 के बाद बर्फ पिघलने की रफ्तार और तेज

रिपोर्ट में सबसे चिंता वाली बात पिछले दशक की है। 1990 से 2000 के बीच ग्लेशियरों की संख्या में मामूली 0.3% बढ़ोतरी हुई, लेकिन इसका मतलब ग्लेशियरों का बढ़ना नहीं था। बड़े ग्लेशियरों के टूटकर छोटे ग्लेशियरों में बदलने से संख्या बढ़ी। दूसरी तरफ क्षेत्रफल लगातार घटता रहा।

2000 से 2010 के बीच ग्लेशियरों की संख्या 0.8% घटी और क्षेत्रफल करीब 4% कम हुआ। 2010 से 2020 के दौरान संख्या में गिरावट बढ़कर 1.7% और क्षेत्रफल में कमी करीब 4.9% हो गई। पूरे 30 वर्षों में ग्लेशियरों की संख्या 2.2% और क्षेत्रफल 11.6% घटा।

संख्या बढ़ती दिखे तो भी खुश होने की वजह नहीं

इस रिपोर्ट का एक बेहद दिलचस्प निष्कर्ष यह है कि छोटे ग्लेशियरों की संख्या कई जगह बढ़ी है, लेकिन उनका कुल क्षेत्रफल घट रहा है। इसकी वजह ग्लेशियरों का टुकड़ों में बंटना और सिकुड़ना है। 2020 में 0.5 वर्ग किमी से छोटे ग्लेशियरों की संख्या 47,452, यानी कुल ग्लेशियरों का 74% थी। लेकिन ये इतने ज्यादा होने के बावजूद कुल ग्लेशियर क्षेत्रफल का सिर्फ 13% और अनुमानित बर्फ भंडार का 24% रखते हैं।

इसके उलट 10 वर्ग किमी या उससे बड़े ग्लेशियर सिर्फ 702, यानी कुल संख्या का लगभग 1% हैं, लेकिन वे कुल ग्लेशियर क्षेत्रफल के 39% और बर्फ भंडार के करीब 40% पर कब्जा रखते हैं।

5,000 से 5,500 मीटर की ऊंचाई पर सबसे ज्यादा नुकसान

ग्लेशियर हर ऊंचाई पर एक जैसी रफ्तार से नहीं पिघल रहे। रिपोर्ट के अनुसार 1990 से 2020 के बीच सबसे बड़ा क्षेत्रफल नुकसान 5,000 से 5,500 मीटर की ऊंचाई पर हुआ। इसके आसपास की 4,500-5,000 मीटर और 5,500–6,000 मीटर ऊंचाई वाली पट्टियों में भी करीब 15-15% क्षेत्रफल कम हुआ। खास तौर पर 5,500 मीटर से नीचे के ग्लेशियर तापमान और वर्षा में बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील पाए गए।

मध्य हिमालय में ग्लेशियर क्षेत्रफल 20.7%, पूर्वी हिमालय में 16.7% और पश्चिमी हिमालय में 12.1% कम हुआ। हिंदू कुश में भी क्षेत्रफल 10.9% घटा। वहीं काराकोरम अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई दिया। यहां ग्लेशियर क्षेत्रफल में सिर्फ 1.7% कमी दर्ज हुई।

गंगा-ब्रह्मपुत्र में बर्फ का बड़ा नुकसान

नदियों के हिसाब से देखें तो तस्वीर और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। गंगा नदी बेसिन में ग्लेशियर क्षेत्रफल 1990 के 9,500.52 वर्ग किमी से घटकर 2020 में 7,518.52 वर्ग किमी रह गया। यानी 20.9% की कमी। ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में क्षेत्रफल 11,241.63 से घटकर 9,450.32 वर्ग किमी रह गया, यानी 15.9% की कमी।

सबसे गंभीर गिरावट सालवीन नदी बेसिन में रही, जहां ग्लेशियर क्षेत्रफल 32.7% घटा। यांग्त्से में 23.1% और पीली नदी में 22.2% की कमी दर्ज की गई।

2020 के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिमी हिमालय में सबसे ज्यादा 12,575 ग्लेशियर हैं। यह पूरे हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों का 19.73% है। लेकिन क्षेत्रफल के मामले में काराकोरम सबसे आगे है। यहां 9,067 ग्लेशियर हैं और उनका कुल क्षेत्रफल 14,653.28 वर्ग किमी है, जो पूरे क्षेत्र के ग्लेशियर क्षेत्रफल का 26.27% है। इसके बाद पश्चिमी हिमालय का हिस्सा 14.12% और मध्य हिमालय का 14.67% है।

उत्तराखंड के ग्लेशियरों पर मंडरा रहा खतरा

उत्तराखंड की नदियों के लिए जीवनरेखा माने जाने वाले हिमालयी ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। वर्ष 1990 से 2020 के बीच उत्तराखंड से जुड़े ऊपरी गंगा क्षेत्र के ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल 18.6 प्रतिशत घट गया। हैरानी की बात यह है कि इस दौरान ग्लेशियरों की संख्या बढ़ी है।

इसका मतलब ग्लेशियर बढ़ नहीं रहे, बल्कि बड़े ग्लेशियर टूटकर छोटे हिस्सों में बंट रहे हैं। अध्ययन में उपग्रह तस्वीरों के आधार पर तीन दशकों में ग्लेशियरों में आए बदलाव का आकलन किया गया है।

उत्तराखंड के हिस्से में 1,448 ग्लेशियर

रिपोर्ट में ऊपरी गंगा क्षेत्र के तहत उत्तराखंड से जुड़े भागीरथी, भिलंगना, मंदाकिनी, अलकनंदा और पिंडर क्षेत्र शामिल हैं। वर्ष 2020 में इन क्षेत्रों में कुल 1,448 ग्लेशियर दर्ज किए गए। इनका कुल क्षेत्रफल 1,628.20 वर्ग किलोमीटर था। 1990 में यहां 1,357 ग्लेशियर थे और इनका क्षेत्रफल 2,000.99 वर्ग किलोमीटर था।

यानी 30 साल में ग्लेशियरों की संख्या 6.7 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन बर्फ से ढका क्षेत्र 372.79 वर्ग किलोमीटर कम हो गया।

उत्तराखंड की पहचान वाले गंगोत्री ग्लेशियर को रिपोर्ट ने गंगा नदी बेसिन का सबसे बड़ा ग्लेशियर बताया है। यह भागीरथी उप-बेसिन में स्थित है और वर्ष 2020 में इसका क्षेत्रफल 125.8 वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया। गंगा बेसिन में 100 वर्ग किलोमीटर से बड़ा यह एकमात्र ग्लेशियर है।

उत्तराखंड से जुड़े ऊपरी गंगा क्षेत्र में ग्लेशियर लगभग 3,816 से 7,454 मीटर की ऊंचाई तक फैले हैं। ग्लेशियरों के सिकुड़ने से एक तरफ भविष्य में जल उपलब्धता पर असर पड़ सकता है, वहीं दूसरी तरफ ग्लेशियर झीलों के बढ़ने, अचानक झील फटने जैसी घटनाओं और हिमालयी आपदाओं का खतरा भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

पिछले दशक में तेजी से बढ़ी ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार

ग्लेशियरों के सिकुड़ने की रफ्तार को लेकर भी रिपोर्ट महत्वपूर्ण संकेत देती है। गंगा नदी बेसिन में 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियर क्षेत्रफल में करीब 21 प्रतिशत की कमी आई। वहीं 2010 से 2020 के दशक में क्षेत्रफल घटने की रफ्तार पहले के दशकों की तुलना में अधिक रही।

उत्तराखंड के ऊपरी गंगा क्षेत्र में भी 2010 से 2020 के दौरान कुल ग्लेशियर क्षेत्रफल 5.6 प्रतिशत घटा। इसके मुकाबले 2000 से 2010 के बीच 5.8 प्रतिशत और 1990 से 2000 के बीच 8.6 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

सबसे ज्यादा ग्लेशियर 5,000 से 6,000 मीटर के बीच

गंगा नदी बेसिन के ग्लेशियरों का 81 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र 5,000 से 6,500 मीटर की ऊंचाई के बीच है। इनमें 64 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र 5,000 से 6,000 मीटर की ऊंचाई के बीच केंद्रित है। अध्ययन के मुताबिक 5,000 से 5,500 मीटर के बीच ग्लेशियर क्षेत्र में करीब 20 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है।

4,500 से 5,000 मीटर के बीच भी लगभग 21 प्रतिशत और 5,500 से 6,000 मीटर के बीच करीब 15 प्रतिशत की कमी सामने आई है। ——————-

ये खबर भी पढ़ें…..

उत्तराखंड में मिला हिमालय के मानसून का पूरा रिकॉर्ड:4,200 साल पहले सूखा पड़ा; 2,600 साल पहले बारिश ने बदली जंगलों की तस्वीर

उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में मौजूद देवरिया ताल सिर्फ एक खूबसूरत झील नहीं है। इसकी तलहटी में जमा मिट्टी की परतों में पिछले 5,200 साल के मौसम का रिकॉर्ड छिपा मिला है। वैज्ञानिकों ने इन परतों में मिले पेड़-पौधों के परागकण यानी पोलन को पढ़कर पता लगाया कि हिमालय में कब मानसून कमजोर पड़ा, कब लंबे समय तक सूखा रहा और कब बारिश इतनी बढ़ी कि जंगलों की तस्वीर ही बदल गई। (पढ़ें पूरी खबर)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

    OpenBuk Bharat (ओपनबुक भारत) आपका भरोसेमंद डिजिटल न्यूज़ पोर्टल है। हम राष्ट्रीय, प्रादेशिक (बिहार), वाणिज्य, और मनोरंजन जगत की हर बड़ी खबर निष्पक्षता और सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।