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कनाडा में भागवत बोले- मदद करना भारत की परंपरा:विविधता ही हमारे देश की खूबसूरती, दूसरों को अलग मानने की सोच छोड़नी चाहिए




कनाडा के टोरंटो में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को कहा कि मुश्किल वक्त में दूसरों की मदद करना भारत की पुरानी परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया में कहीं भी संकट आया और भारत से मदद मांगी गई, तो भारत ने कभी पीछे हटकर इनकार नहीं किया। कई बार भारत ने बिना मदद मांगे भी दूसरों की सहायता की है। भागवत ने कहा- भारत में विविधता एकता के खिलाफ नहीं, बल्कि उसकी खूबसूरती है। देश में अलग-अलग जाति, पंथ, भाषाएं और संस्कृतियां हैं, लेकिन ये सभी एक ही समाज का हिस्सा हैं। उन्होंने विविधता को स्वीकार करने और उसका सम्मान करने की बात कही। उन्होंने कहा कि ‘ये मेरा, वो तुम्हारा’ जैसी सोच से ऊपर उठने की जरूरत है। अलग-अलग रूप और पहचान के बावजूद सभी में एक ही दिव्यता है। इसलिए दूसरों को अलग या पराया मानने के बजाय सभी के साथ भाईचारे और सेवा की भावना रखनी चाहिए। कार्यक्रम में 8 प्रांतों से पहुंचे 2,500 से ज्यादा लोग भागवत टोरंटो में ‘हिंदू विश्व बंधु–मित्रता के साथ दुनिया को अपनाएं’ कार्यक्रम में शामिल हुए। इसका आयोजन कैनेडियन हिंदूज फॉर आउटरीच, रिलेशंस एंड डायलॉग (CHORD) ने किया था। कार्यक्रम में पूर्व कनाडाई रक्षा मंत्री और अल्बर्टा के पूर्व प्रीमियर जेसन केनी भी मौजूद थे। आयोजकों के मुताबिक, कनाडा के आठ प्रांतों से 2,500 से ज्यादा लोग पहुंचे। CHORD के आयोजक नरेश चावड़ा ने कहा कि यह समुदाय के लिए उत्सव का मौका था। पूर्व रॉयल कैनेडियन एयर फोर्स अधिकारी कार्तिक त्रिवेदी ने कहा कि उन्होंने 15 साल तक कनाडा की सेवा की है और उन्हें अपनी हिंदू पहचान पर गर्व है। वहीं, राजेश भाटिया ने कार्यक्रम के माहौल को उत्सव जैसा बताया और कहा कि लोग भागवत के विचार सुनने के लिए उत्साहित हैं। ग्रेटर टोरंटो एरिया के हिंदू सभा मंदिर के राजिंदर प्रसाद ने भागवत के दौरे को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार के संदेश से जोड़ा। पथिक शुक्ला ने भी शांति, सद्भाव और भाईचारे का संदेश फैलाने की अपील की। आयोजकों ने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य संस्कृति, मूल्यों, मित्रता और वैश्विक सद्भाव को बढ़ावा देना है। भागवत के भाषण की 5 बड़ी बातें विविधता एकता की अभिव्यक्ति है: भागवत ने कहा कि भारत में विविधता कभी एकता के लिए समस्या नहीं रही। भारतीय परंपरा सिर्फ ‘विविधता में एकता’ की बात नहीं करती, बल्कि विविधता को ही एकता का हिस्सा मानती है। इसे स्वीकार करना, सम्मान देना और सेलिब्रेट करना चाहिए। अलग-अलग हैं, लेकिन सब एक हैं: उन्होंने कहा कि भारत में कई जातियां, पंथ और भाषाएं हैं। सब कुछ अलग-अलग है, लेकिन “हम यह नहीं कहते कि सभी एक जैसे हैं, हम कहते हैं कि सब एक हैं।” उनके मुताबिक, विविधता प्रकृति का स्वभाव है, जबकि एकता वास्तविकता है। हर चीज में दिव्यता है: भागवत ने कहा कि ईश्वर ने जो कुछ बनाया है, वह अलग-अलग रूप, आकार और रंगों में उसकी सुंदरता और पवित्रता को दिखाता है। हर चीज दिव्य है, इसलिए हर चीज एक है। ‘मेरा-तुम्हारा’ की सोच संकीर्णता है: उन्होंने कहा कि अगर हम सोचते हैं कि “यह मेरा है और वह तुम्हारा है”, तो यह सही नहीं है। दुनिया की हर चीज को अपना मानना चाहिए, लेकिन मालिक के तौर पर नहीं, भाई के तौर पर। शरीर, रंग और रूप अलग होने के बावजूद हर व्यक्ति की गरिमा और महत्व बराबर है। दूसरों की सेवा करना हमारा कर्तव्य है: भागवत ने कहा कि जब हम सभी को एक मानते हैं, तो दूसरों की सेवा करना हमारा कर्तव्य बन जाता है। यह सोच इंसान को ऐसी खुशी और संतुष्टि देती है जो स्थायी होती है। उन्होंने कहा कि भारत को मिला यह ज्ञान दुनिया के साथ साझा करना भी हमारा कर्तव्य है।



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