Headlines

समस्तीपुर- पूसा में बनती थी आजादी की जंग की रणनीति:धरोहर के रूप में सुरक्षित है राजेंद्र बाबू की पलंग; यहीं गिरफ्तार हुए थे खुदीराम बोस




देश की आजादी की लड़ाई का प्रमुख केंद्र समस्तीपुर जिले का पूसा रोड स्थित वैनी भी रहा है। आजादी की लड़ाई के दौरान वैनी गांव स्थित खादी ग्राम उद्योग स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों और रणनीति का प्रमुख केंद्र था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अगुवाई में यहां स्वतंत्रता सेनानी आजादी की लड़ाई की रणनीति तैयार करते थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद करीब डेढ़ साल तक वैनी में रहकर स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति तैयार करते रहे। उनके अलावा डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, पंडित रामनंदन मिश्र, ब्रजकिशोर प्रसाद, गोपालजी मिश्रा, तिलापत सिंह, विनोदानंद झा, श्रीकृष्ण सिंह, यूएन ढेबर, महामाया प्रसाद, जननायक कर्पूरी ठाकुर और लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी कई बार यहां आ चुके हैं। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए वॉर रूम था अखिल भारतीय चरखा संघ का कार्यालय उस समय अखिल भारतीय चरखा संघ का कार्यालय स्वतंत्रता सेनानियों के लिए किसी वार रूम की तरह था। यहां आंदोलन की रणनीति तैयार की जाती थी और फिर उसे देश के अलग-अलग हिस्सों में लागू किया जाता था। इसी दौरान डॉ. राजेंद्र प्रसाद जिस भवन में रहते थे, आज उस भवन का नाम डॉ. राजेंद्र प्रसाद भवन रखा गया है। उनके समय के कई संस्मरण आज भी यहां सुरक्षित हैं। धरोहर के रूप में सुरक्षित है डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पलंग डॉ. राजेंद्र प्रसाद जिस पलंग पर आराम करते थे, उसे भी धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा गया है। पूसा खादी ग्राम उद्योग के मंत्री धीरेंद्र कार्जी बताते हैं कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद के इस्तेमाल में रहा सागवान की लकड़ी का यह पलंग आज भी सुरक्षित है। इसकी नियमित देखरेख की जाती है और संस्था की राशि से समय-समय पर इसका रंग-रोगन कराया जाता है, जिससे यह आज भी काफी अच्छी स्थिति में है। उन्होंने बताया कि उस समय यहां अखिल भारतीय चरखा संघ का कार्यालय था और डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके बिहार एजेंट के रूप में काम करते थे। देश की आजादी और बाद में राष्ट्रपति बनने के बाद भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद दो-तीन बार पूसा आए थे। खादी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्होंने इस केंद्र को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय सरकार की ओर से भी संस्था को काफी सहयोग मिला। 1 मई 1908 को वैनी की एक भुंजा दुकान से गिरफ्तार हुए थे खुदीराम बोस “एक बार विदाई देबो मां, घुरि आसी, हांसी-हांसी परबो फांसी…” जैसे भावों के साथ देश के लिए बलिदान देने वाले क्रांतिकारी खुदीराम बोस को 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारा में फांसी दी गई थी। इससे पहले उन्हें 1 मई 1908 को समस्तीपुर के वैनी पूसा स्टेशन (अब खुदीराम बोस पूसा स्टेशन) के पास से गिरफ्तार किया गया था। जिस स्थान से खुदीराम बोस को गिरफ्तार किया गया था, वहां आज उनका स्मारक स्थल बना हुआ है। यह स्मारक आजादी के लिए दिए गए उनके बलिदान की याद दिलाता है। इतिहास के रिकॉर्ड के अनुसार, 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के तत्कालीन जिला जज किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंका था। हालांकि, उस रात बग्घी में किंग्सफोर्ड के स्थान पर उनके अतिथि वकील प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी सवार थीं। बम हमले में दोनों की मौत हो गई। बम कांड को अंजाम देने के बाद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी पैदल रेलवे लाइन के रास्ते रातों-रात पूसा पहुंच गए। 1 मई 1908 की सुबह दोनों वैनी पूसा रेलवे स्टेशन के सामने कुएं के पास बैठकर जीतू साह की दुकान से भुंजा खरीदकर खाने लगे। जीतू साह के परपोते राजेश साह बताते हैं कि उन्हें अपने दादा और पिता से जानकारी मिली थी कि जिस स्थान पर आज स्मारक बना है, उसी जगह उनके परबाबा की भुंजा की दुकान थी। उनकी दुकान पर कुछ युवक बैठे थे। इसी दौरान किसी ने बम कांड की चर्चा करते हुए कहा कि जज किंग्सफोर्ड बच गया, जबकि बग्घी में सवार दो महिलाओं की मौत हो गई। यह सुनते ही दोनों युवक चौंक गए। इसके बाद अंग्रेजों के मुखबिरों ने वहां से कुछ दूरी पर खड़े दो सिपाहियों, फतह सिंह और शिव प्रसाद मिश्र को इसकी सूचना दी। पुलिस को देखते ही प्रफुल्ल चाकी वहां से भागने में सफल हो गए, लेकिन खुदीराम बोस पकड़े गए। बाद में उन्हें मुजफ्फरपुर ले जाया गया, जहां मुकदमे के बाद उन्हें फांसी की सजा दी गई। आज उस घटना की कहानी सुनकर दुख होता है कि कैसे अंग्रेजों के शासनकाल में अपने ही देश के एक युवा क्रांतिकारी को पकड़वा दिया गया। वैनी में बना उनका स्मारक आज भी खुदीराम बोस के साहस, संघर्ष और बलिदान की कहानी लोगों को याद दिलाता है।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *