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भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा- सिर्फ कानून बना देने से आम लोगों तक न्याय नहीं पहुंच सकता। न्याय व्यवस्था और जनता के बीच दूरी नहीं होनी चाहिए। जरूरतमंद व्यक्ति जब कानूनी मदद के लिए पहुंचे तो पहले उसकी बात सुनी जाए, उसे सम्मान मिले। जरूरतमंद की समस्या को समझा जाए। इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में 8 और 9 अगस्त को आयोजित पश्चिम क्षेत्रीय सम्मेलन में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा- हर क्षेत्र की समस्या अलग होती है, इसलिए समाधान भी स्थानीय होना चाहिए। लोगों तक उनकी स्थानीय बोली में कानूनी अधिकार और मदद पहुंचानी होगी। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा- आम नागरिक के लिए न्याय का अनुभव केवल राहत, मुआवजा, केस में बरी होने या सजा मिलने तक सीमित नहीं है। न्याय का अनुभव उससे पहले शुरू हो जाता है। आम नागरिक को न्याय देने से पहले महसूस हो कि उसकी बात सुनी गई है। उसे सम्मान मिला है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा- विधिक सेवा व्यवस्था का संवाद केवल बैठकों और सम्मेलनों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि राष्ट्रीय स्तर से राज्य, जिला, तालुका और पैरा-लीगल वालंटियर तक लगातार चलना चाहिए। हर क्षेत्र की समस्या अलग, समाधान भी स्थानीय होना चाहिए जस्टिस सूर्यकांत ने कहा- मध्यप्रदेश के आदिवासी परिवार, गोवा के मछुआरा समुदाय, गुजरात के प्रवासी मजदूर या मुंबई में कानूनी सहायता मांगने वाली महिला की समस्याएं एक जैसी नहीं हो सकतीं। इसलिए सभी के लिए एक जैसा समाधान भी संभव नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा- लीगल सर्विसेज इंस्टीट्यूशन को यह सोच बदलनी होगी कि जरूरतमंद व्यक्ति स्वयं उनके पास आए। इसके बजाय संस्थाओं को लोगों तक पहुंचना चाहिए। नई योजनाएं शुरू करना और आंकड़े बढ़ाना ही समावेशन नहीं है। लगातार यह सवाल पूछना होगा कि क्या कोई और गांव है जहां पहुंचना बाकी है। कोई और कमजोर समुदाय है, जिससे जुड़ना बाकी है। कोई दूसरी भाषा है, जिसमें कानूनी अधिकार समझाने की जरूरत है, या कोई ऐसी बाधा है जिसे हटाना जरूरी है। अहिल्याबाई होलकर से लिया न्याय का उदाहरण जस्टिस सूर्यकांत ने मध्यप्रदेश की लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के न्याय के प्रति समर्पण का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उनका शासन आम लोगों से सीधे जुड़ा था। अहिल्याबाई किसानों, विधवाओं और व्यापारियों से प्रतिदिन सीधे मिलती थीं। उनके और जनता के बीच कोई भेदभाव या मध्यस्थता नहीं थी। आज की विधिक सेवा व्यवस्था के लिए भी यह संदेश है कि न्याय व्यवस्था को आम नागरिक के करीब ले जाना होगा। उसकी समस्या को सीधे समझना होगा। CM यादव बोले- न्याय में पुत्र और प्रजा में भेद नहीं होना चाहिए कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा- न्याय की भारतीय परंपरा बेहद समृद्ध और गौरवशाली रही है। शासक के लिए न्याय करते समय पुत्र और प्रजा में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने अपने शासन में इस आदर्श को व्यवहार में उतारकर दिखाया था। उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई ने अपने इकलौते पुत्र की गलती पर उसे भी वही दंड दिया, जो सामान्य व्यक्ति को अपराध करने पर मिलता। गलती चाहे किसी से भी हो, न्याय सबके लिए समान होना चाहिए। मध्यस्थता और आपसी समाधान पर चर्चा पहले सत्र में अदालत के बाहर बातचीत और मध्यस्थता से विवाद सुलझाने पर चर्चा होगी। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मनमोहन करेंगे। जस्टिस शील नागू सह-अध्यक्ष रहेंगे। इसके साथ ही MP हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अमन एम. हिंगोरानी मुख्य वक्ता रहेंगे।
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CJI सूर्यकांत बोले- सिर्फ कानून बनाने से नहीं मिलेगा न्याय:इंदौर में कहा- जनता-न्याय व्यवस्था के बीच दूरी न हो; स्थानीय बोली में दें कानूनी मदद
