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जापान के मूवेबल लॉन्चर-5 से लॉन्च हुआ 5 टन वजनी MMX मिशन; रॉकेट का मुख्य इंजन स्टार्ट होते ही आग और धुएं का गुबार उठा।
जापान ने आज 20 अक्टूबर को मंगल ग्रह के सबसे बड़े चांद ‘फोबोस’ के लिए मिशन लॉन्च किया है। मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन मिशन के तहत तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से H3 रॉकेट के जरिए करीब 5 टन का स्पेसक्राफ्ट अंतरिक्ष में भेजा गया है।
मिशन का मकसद फोबोस पर लैंड करना, वहां की मिट्टी-धूल के नमूने जुटाना और उन्हें साल 2031 तक धरती पर वापस लेकर आना है। जापान का पिछला मंगल मिशन नाकाम रहा था, हालांकि उसने दो बार एस्टेरॉयड से नमूने लाकर काबिलियत साबित की है।
मंगल के दोनों चांद फोबोस और डीमॉस पर आज तक दुनिया का कोई भी देश नहीं पहुंच पाया है। मंगल या उसके चांद से मिट्टी का एक टुकड़ा भी अब तक धरती पर नहीं लाया जा सका है। अगर जापान यह कर लेता है, तो यह इतिहास में पहली बार होगा।

जापानी स्पेस एजेंसी JAXA ने मंगलवार को तानेगाशिमा द्वीप स्थित स्पेसपोर्ट से स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किया।

मंगलवार को तानेगाशिमा स्पेस सेंटर में रॉकेट की लॉन्चिंग देखते लोग।
स्पेसक्राफ्ट मंगल पर अगले साल पहुंचेगा, 2031 में वापस लौटेगा
- 2027 के अंत में स्पेसक्राफ्ट मंगल के करीब पहुंचेगा और फोबोस के चक्कर लगाने लगेगा।
- 2028 के आखिर या 2029 में मुख्य लैंडर फोबोस की जमीन पर उतरेगा।
- 2030 में दूसरे चांद डीमॉस के पास से गुजरते हुए स्पेसक्राफ्ट धरती की तरफ मुड़ेगा।
- 2031 में सैंपल कैप्सूल ऑस्ट्रेलिया के रेगिस्तान में उतरेगा।

फोबोस असल में एक आलू जैसी टेढ़ी-मेढ़ी चट्टान है, जो करीब 22 किमी चौड़ी है।

रोवर पहले उतरेगा, स्पेसक्राफ्ट बाद में। 10 ग्राम सैंपल 2031 में ऑस्ट्रेलिया में लेकर उतरेगा।
सतह पर गेंद की तरह कुछ देर उछलता रहेगा रोवर
फोबोस पर उतरने वाले रोवर का नाम ‘इडेफिक्स’ है। यह एक छोटे माइक्रोवेव ओवन जितना बड़ा है और इसमें 4 पहिए लगे हैं। फोबोस पर ग्रैविटी बहुत ही कम है, इसलिए रोवर सतह पर गिरते ही गेंद की तरह कुछ मिनट तक उछलता रहेगा और फिर जाकर टिकेगा।
अगर यह उल्टा गिरता है, तो खुद को सीधा कर लेगा। पर एक बार इसके सोलर पैनल खुल गए, तब यह खुद सीधा नहीं हो पाएगा। किसी गड्ढे या ढीली मिट्टी में फंसने से बचने के लिए यह बहुत संभलकर महज 1 मिलीमीटर प्रति सेकंड की धीमी चाल से चलेगा।
रोवर 100 दिनों तक फोबोस की जमीन पर घूमेगा
इडेफिक्स रोवर करीब 100 दिनों तक फोबोस पर घूमेगा। उसका काम मुख्य लैंडर के लिए एक सुरक्षित जगह तलाशना है, ताकि लैंडर किसी रेतीले दलदल या नुकीले पत्थरों में न फंसे।
सुरक्षित जगह मिलने पर चार पैरों वाला लैंडर सतह पर उतरेगा। वह वहां सिर्फ 2 घंटे रुकेगा। ड्रिल और वैक्यूम सिस्टम से 10 ग्राम मिट्टी-पत्थर बटोरेगा और फौरन अंतरिक्ष में लौट जाएगा।
दो सवालों का जवाब तलाश रहे वैज्ञानिक
1. क्या यह चांद मंगल से किसी उल्कापिंड के टकराने के बाद टूटे टुकड़ों से बना?
2. यह अंतरिक्ष में भटकता हुआ कोई एस्टेरॉयड था, जिसे मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने पकड़ लिया?
इसके अलावा, फोबोस की धूल में मंगल के पुराने कण भी मिल सकते हैं। इससे एक ही बार में मंगल और उसके चांद दोनों की जानकारी मिल जाएगी, जिससे यह समझने में मदद मिलेगी कि ग्रह कैसे बने और क्या वहां कभी जीवन पनपने के हालात थे।
चीन-अमेरिका भी मंगल से सैंपल लाने की तैयारी में
इस रेस में चीन भी शामिल है। चीन 2028 में मंगल की सतह से सैंपल लाने का मिशन शुरू करेगा और वह भी 2031 तक सैंपल लाने का टारगेट बना रहा है।
उधर अमेरिका का पर्सिवियरेंस रोवर मंगल की सतह पर 30 से ज्यादा ट्यूब्स में मिट्टी भर चुका है, लेकिन उसे धरती पर लाया जायेगा यह तय नहीं है।

