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कादीबिगहा काली मंदिर में भक्तों का जनसैलाब:141 साल से हो रही मां की अराधना, भभूत लेने उमड़ती है भीड़; अपराध पर दंड और क्षमा की अटूट आस्था




नालंदा जिला मुख्यालय से छह किलोमीटर दूर एनएच 20 के पास स्थित कादीबिगहा गांव इन दिनों श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां करीब 141 साल पुराने मां काली के दरबार की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। नवरात्र, विशेषकर महाअष्टमी के अवसर पर माता के दर्शन और महाप्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तों का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ता है। इस पावन दरबार की सबसे अनूठी विशेषता यहां का महाप्रसाद है, जिसमें श्रद्धालुओं को हवनकुंड की पवित्र भभूत दी जाती है। भक्त इस भभूत को ताबीज में भरकर धारण करते हैं और हर मांगलिक कार्य में इसका उपयोग करते हैं। अपराध पर तत्काल दंड और क्षमा की अटूट आस्था ग्रामीणों की दृढ़ मान्यता है कि मां काली पूरे गांव की रक्षक हैं और किसी भी विपदा को सीमा के भीतर नहीं आने देती। दरबार की मर्यादा ऐसी है कि यदि कोई व्यक्ति गलत आचरण, चोरी या नुकसान पहुंचाने की चेष्टा करता है तो उसे तत्काल माता के कोप-दंड का भागी बनना पड़ता है। हालांकि, सच्चे मन से की गई क्षमायाचना पर माता उसे अभयदान भी दे देती हैं। इसी श्रद्धा के चलते जिस तालाब में प्रतिमा का विसर्जन होता है, उसके आसपास रखी वस्तुओं तक को कोई हाथ नहीं लगाता और न ही कोई उसमें मवेशियों को नहलाने की जुर्रत करता है। सूनी गोद में किलकारी और रोजगार की पूरी होती मुराद स्थानीय निवासी बेनी माधव महेंद्र उर्फ चुन्नू ने बताया कि माता के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। जिन दंपतियों के घरों में लंबे समय तक संतान का सुख नहीं होता, मां के आशीर्वाद से उनकी सूनी गोद भर जाती है। वहीं वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद भी रोजगार से वंचित युवाओं को यहां शीश नवाते ही सफलता मिलती है। यही कारण है कि गांव व आसपास के युवाओं की जब भी नौकरी लगती है, वे अपनी पहली पूरी तनख्वाह दान स्वरूप मां के चरणों में समर्पित कर देते हैं। सामाजिक समरसता और पीढ़ियों से चली आ रही मर्यादा कादीबिगहा का यह मंदिर सामाजिक सौहार्द की भी बेजोड़ मिसाल पेश करता है। मंदिर में पूजा कराने के लिए किसी एक पुरोहित का एकाधिकार नहीं है, बल्कि गांव के पांच-छह ब्राह्मण परिवारों से बारी-बारी से हर वर्ष नया पुरोहित चुना जाता है। सेवा कार्य में शंकर मिस्त्री उर्फ भगत जी अनवरत जुटे रहते हैं। प्रतिमा निर्माण और आगमन में भी अद्भुत परंपरा देखने को मिलती है। बिहारशरीफ के पुलपर इलाके के मूर्तिकार के वंशज ही पीढ़ियों से मां की प्रतिमा गढ़ते हैं। इसके बाद सप्तमी के दिन जब प्रतिमा गांव लाई जाती है, तो सबसे पहले रामवृक्ष पासवान के वंशज ही उसे अपने शीश पर उठाते हैं, जिसके बाद अन्य ग्रामीण बारी-बारी से पैदल चलकर उसे गांव तक पहुंचाते हैं। सात्विक बलि, स्वर्णाभूषणों से शृंगार और तीन दिवसीय अनुष्ठान मंदिर में किसी भी प्रकार की पशु बलि पर पूरी तरह पाबंदी है और सात्विक परंपरा के तहत केवल भुआ (कोहड़ा) की बलि दी जाती है। महाअष्टमी के दिन स्थापित होने वाली माता की प्रतिमा का शृंगार भक्तों द्वारा अर्पित स्वर्णाभूषणों और 51 साड़ियों से किया जाता है। माता दो दिन मंदिर में विराजने के बाद दशमी को गांव के बगीचे में लाई जाती हैं, जहां विशाल मेला लगता है। अंततः एकादशी के दिन गांव के ही ऐतिहासिक तालाब में प्रतिमा का विसर्जन संपन्न होता है। वर्तमान में ‘मां महाकाली क्लब’ और श्रद्धालुओं के सहयोग से गांव के तालाब के पास एक और भव्य मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है।



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