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'घर का इकलौता चिराग चला गया,प्रशासन से मदद नहीं मिली':गंगा में डूबे 2 दोस्तों का 7 दिन बाद भी पता नहीं चला, पुतला बनाकर दोनों का किया अंतिम संस्कार




बेगूसराय के गढ़हरा गोढ़ियारी टोला के दो परिवारों के चिरागों और उनकी खुशियों को हमेशा-हमेशा के लिए गंगा की उग्र धारा में बहा ले गई। देश की रक्षा के लिए सेना और पुलिस बल में भर्ती होने का सपना संजोए दो जिगरी दोस्त अंकित (20) और शिवम (19) सिमरिया भोला घाट पर स्नान के दौरान गंगा की तेजधार में समा गए। किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि उनके माता-पिता को अपने लाडलों की अंतिम झलक तक नसीब नहीं होगी। हादसे के सात दिन बीत जाने के बाद भी दोनों का कुछ पता नहीं चला। निराश और असहाय परिजनों ने सनातन परंपरा के अनुसार शुक्रवार को कुश से दोनों युवकों के पुतले बनाकर जयनगर गंगा घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया। सनातन परंपरा के अनुसार सोमवार को नखबाल, मंगलवार को एकादशा, बुधवार को द्वादशा और गुरुवार को अंतिम क्रिया कर्म कराया जाएगा। हादसे की 2 तस्वीरें… अब सिलसिलेवार तरीके से जानिए क्या है पूरा मामला विधि-विधान से किया अंतिम संस्कार अंकित के पिता राम प्रताप सहनी ने बताया कि मेरा इकलौता बेटा था। सात दिनों की अनवरत तलाश और प्रशासनिक बेरुखी के बाद जब बची-खुची उम्मीदें भी दम तोड़ गई तो पंडितों से पूछा। सनातन धर्मशास्त्रों और कर्मकांड के विधान अनुसार पानी में डूबने के बाद सात दिनों तक जब मृत शरीर की प्राप्ति न हो तो कुश (पवित्र घास) का पुतला बनाकर दाह संस्कार करने का स्पष्ट नियम है। पंडितों के परामर्श पर दोनों परिवारों ने आपस में सहमति बनाई और शुक्रवार को अपने जिगर के टुकड़ों के प्रतीक रूप में पुतले तैयार किए। दोनों का पुतला बनाकर नया कपड़ा पहनाया गया और अर्थी सजाई गई। जयनगर गंगा घाट पर पुतलों का अंतिम संस्कार किया गया। अंकित के पुतले को छोटी बहन दीपिका ने मुखाग्नि दी। वहीं दूसरी ओर, बिरजू राम के बेटे शिवम के पुतले को उसके छोटे भाई अंशु कुमार ने कांपते हाथों से मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी है। दोनों दोस्तों की घर की दूरी सिर्फ 100 मीटर गढ़हरा वार्ड नंबर-16 निवासी राम प्रताप सहनी के पुत्र अंकित कुमार और उनके घर से महज 100 मीटर की दूरी पर रहने वाले बिरजू राम के पुत्र शिवम कुमार की बचपन की दोस्ती पूरे गांव में चर्चित थी। तेयाय कॉलेज में बीए सेकंड पार्ट में पढ़ाई करने वाले दोनों होनहार छात्र पिछले दो सालों से पूरे जुनून के साथ सेना और पुलिस भर्ती की तैयारी में लगे हुए थे। प्रतिदिन तड़के जागना, शरीर को सुगठित बनाना और गंगा किनारे पसीना बहाना उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा था। अंकित अपने पिता का इकलौता बेटा था और दो बहनों के बीच घर का अकेला चिराग व बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था। उसके पिता राम प्रताप सहनी बिजली वायरिंग का काम करके किसी तरह अपने परिवार की जीविका चलाते हैं। वहीं दूसरी ओर शिवम अपने दो भाइयों में बड़ा था और उसके पिता बिरजू राम पेशे से फर्नीचर मिस्त्री हैं। दोनों साधारण परिवारों के बच्चे अपनी मेहनत के दम पर अपने परिवार की गरीबी को दूर करने और सरहद पर देश की रक्षा करने का सपना देख रहे थे। ‘अनहोनी की आशंका से बेटे को रोका था’ अंकित की मां सुनीता देवी हादसे के दिन की उस मनहूस सुबह को याद करते हुए अपने आंसुओं को रोक नहीं पाती। रोते हुए बताती हैं कि जिउतिया पर्व के दिन(3 अक्टूबर) सुबह अंकित सुबह ही सोकर उठ गया था। उसने मुंह-हाथ धोया, जिसके बाद बड़े प्यार से उसे एक कोर खाना खिलाया। मन में किसी अनहोनी का अंदेशा हुआ तो उसे नदी किनारे जाने से मना किया। बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा मम्मी हम गंगा में नहाते नहीं हैं। इसके बाद वह पानी की बोतल और थैला उठाकर अपने दोस्त शिवम के साथ निकल पड़ा। क्या मालूम था मेरे जिगड़ का टुकड़ा दोबारा वापस लौटकर नहीं आएगा। ‘बेटा रोज गंगा में स्नान के लिए नहीं जाता था’ उधर, शिवम की मां कोमल देवी बताती हैं कि जिउतिया पर्व की सुबह उनका बेटा घर से निकला था। वह रोज गंगा में नहाने नहीं जाता था, घूमकर वापस आ जाता था। लेकिन उस दिन पर्व होने के कारण कसरत के बाद स्नान करने उतर गया। करीब 5 बजे दोनों अपनी-अपनी साइकिल से सिमरिया भोला घाट पहुंचे, जहां उन्होंने व्यायाम किया और दौड़ लगाई। कसरत के बाद शरीर का पसीना सुखाकर जब दोनों गंगा के जल में उतरे, तो अचानक नदी का गहरा पानी और उफान मारती तेजधार उनके सामने काल बनकर आ गई। स्नान के दौरान एक दोस्त असंतुलित होकर गहरे पानी में समाने लगा। अपने साथी को डूबता देख दूसरे दोस्त ने उसे बचाने का प्रयास किया, लेकिन गंगा की धारा ने दोनों को आगोश में ले लिया। ‘मुंबई से घर पर आया कॉल’ परिजन के मुताबिक, घाट के मुहाने पर केवल उनकी दो साइकिलें, चप्पलें, कपड़े, मोबाइल फोन, झोला और पानी की बोतलें धरी की धरी रह गई। मौजूद लोगों के बचाने का प्रयास भी बेकार हो गया। उसने वहां रखे शिवम के मोबाइल फोन से अंतिम डायल किए गए नंबर पर कॉल किया, जो मुंबई में रहने वाले एक रिश्तेदार का था। मुंबई से घर पर फोन आया कि आपका बेटा कहां है, उसका सामान गंगा घाट पर पड़ा हुआ है। दोनों के परिजन बदहवास होकर भोला स्थान घाट पहुंचे। घर में चीख-पुकार मच गई। बेटों के लापता होने की खबर मिलते ही परिजनों ने अपनी पूरी ताकत तलाशने में झोंक दी। तीन घंटे बाद एसडीआरएफ पहुंची। लेकिन तीन दिन तक खोज नहीं सकी। सैकड़ों किलोमीटर तक सर्च अभियान परिजनों ने अपने निजी खर्च से भाड़े पर नाव, गोताखोर, जनरेटर और सर्च लाइटों का इंतजाम किया और लगातार 24-24 घंटे गंगा की लहरों को खंगाला। अपनों की तलाश में परिजन सिमरिया भोला से लखीसराय, डुमरिया, मुंगेर, नवगछिया और भागलपुर तक सैकड़ों किलोमीटर तक गंगा नदी के तटों पर भटकते रहे। परिवार के लोगों ने नदी किनारे रहने वाले हर इंसान और मल्लाहों से गुहार लगाई, लेकिन सात दिनों तक अनवरत खोजबीन के बावजूद न तो अंकित का कोई पार्थिव शरीर मिला और न ही शिवम का कोई सुराग मिला। प्रशासनिक उपेक्षा और नाकामी ने पीड़ित परिवारों के जख्मों पर मिर्च छिड़कने का काम किया। ‘प्रशासन से मदद नहीं मिली’ अंकित के चाचा शक्ति कुमार सहनी ने कहा कि प्रशासन ने इस मामले में कुछ नहीं किया है। हादसे के तुरंत बाद सीओ, बीडीओ, थाना प्रभारी से एनडीआरएफ (NDRF) की टीम को बुलाने की गुहार लगाई थी। सीओ ने आश्वासन दिया था कि अगले दिन सुबह 9 बजे एनडीआरएफ की टीम उपलब्ध करा दी जाएगी। अगली सुबह अधिकारियों ने साफ कह दिया कि एनडीआरएफ की टीम उपलब्ध नहीं है, क्योंकि सीवान जिले में कोई बड़ा हादसा हो जाने के कारण टीम वहां चली गई है। क्या बिहार सरकार इतनी गरीब और असहाय है कि दो होनहार युवाओं के नदी में डूबने पर एक एनडीआरएफ की टीम तक नहीं भेज सकती। ‘प्रशासन का कोई अधिकारी घर तक नहीं आया’ शक्ति कुमार सहनी ने आगे कहा कि इलाके का कोई तटबंध टूट जाए, तो क्या सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएगी। उन्होंने पुलिस तंत्र की प्राथमिकताओं पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि अगर इलाके में कहीं शराब पीने वाला या छोटा-मोटा धंधेबाज पकड़ा जाता है, तो पुलिस हफ्तों तक उस गली का घेराव करके घूमती रहती है। लेकिन जब दो गरीब परिवारों के बच्चों की जान चली गई, तो सात दिन बीत जाने के बाद भी प्रशासन का कोई जिम्मेदार अधिकारी सांत्वना देने तक उनके घर नहीं आया। ‘गुहार लगाने के बाद भी किसी ने नहीं सुनी’ शिवम के पिता बिरजू राम ने भी प्रशासनिक दावों की पोल खोलते हुए बताया कि बार-बार गुहार लगाने के बावजूद एनडीआरएफ की कोई टीम नहीं आई। केवल एसडीआरएफ (SDRF) की एक टीम घटना के दिन 8 बजे पहुंची और दो-तीन दिनों तक खानापूर्ति करने के बाद वापस लौट गई। गरीब परिवार का बच्चा होने के कारण प्रशासन ने ढिलाई बरती। यही हादसा किसी बड़े लोगों के बच्चे के साथ हुआ होता, तो पूरा प्रशासनिक तंत्र अत्याधुनिक उपकरण लेकर पानी में उतार दिए जाते। देश की रक्षा के लिए दौड़ लगाने वाले गरीब के बेटों की जान की कीमत सिस्टम की नजर में कुछ भी नहीं समझी गई। गांव, घर में पसरा सन्नाटा फिलहाल बीहट नगर परिषद के गढ़हरा गोढ़ियारी टोले की जिन संकरी गलियों में अंकित और शिवम कभी अपने फौलादी इरादों के साथ देश सेवा के सपने बुना करते थे। अब वहां सिर्फ सन्नाटा, बेबसी और परिजनों के करुण क्रंदन की आवाजें गूंज रही हैं। जो दो वीर युवा कल तक सेना की वर्दी पहनकर भारत मां का मस्तक ऊंचा करने का सपना देख रहे थे, आज उनकी अस्थियां तक उनके परिजनों के हाथ में नहीं आ सकी।



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