नई दिल्लीकुछ ही क्षण पहले
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देश की पहली स्प्रिंग सेंसस के दूसरे हिस्से में 10 राज्यों के 14,468 झरनों की गिनती हुई है। इनमें सबसे ज्यादा झरने मणिपुर और महाराष्ट्र में मिले हैं। जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की करीब 15% आबादी यानी लगभग 20 करोड़ लोग सीधे या परोक्ष रूप से झरने के पानी पर निर्भर हैं।
यह रिपोर्ट 25 सितंबर को भारत मंडपम में हुए 9वें इंडिया इंटरनेशनल वाटर वीक 2026 के समापन समारोह में जारी की गई।
इसमें आंध्र प्रदेश, असम, गोवा, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
सेंसस का मकसद झरनों का भरोसेमंद, एक जैसे मानकों वाला और जियो-रेफरेंस्ड डेटा तैयार करना था। इससे योजनाएं बनाने, झरना-क्षेत्र प्रबंधन और नीतियां तैयार करने में मदद मिलेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, मणिपुर में 3,941 और महाराष्ट्र में 3,652 झरने मिले हैं। ओडिशा में 1,957, पश्चिम बंगाल में 1,686 और गोवा में 1,196 झरने दर्ज किए गए।
त्रिपुरा में 1,049, असम में 792, तेलंगाना में 148, आंध्र प्रदेश में 34 और राजस्थान में 13 झरने मिले हैं।
रिपोर्ट का नाम ‘फर्स्ट सेंसस ऑफ स्प्रिंग्स (वॉल्यूम II, पार्ट-II)’ है। इसमें संकटग्रस्त और बेहद जरूरी झरनों की पहचान के लिए व्यवस्थित मैपिंग की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बुनियादी ढांचा तैयार करते समय इन झरनों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, झरना-क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रमों के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए।
पहले वॉल्यूम II की रिपोर्ट बिहार, कर्नाटक, केरल, लद्दाख, सिक्किम और तमिलनाडु के लिए जारी की गई थी। यह रिपोर्ट इंडिया वाटर डे 2026 पर प्रकाशित हुई थी।
महाराष्ट्र में 3,652 झरने
महाराष्ट्र में 2,629 झरने पूरे साल बहने वाले, 909 मौसमी और 114 सूखे हैं। इनमें 3,612 झरने ग्रामीण और 40 शहरी इलाकों में हैं।
इनमें करीब 86.5% झरने सरकारी या सार्वजनिक स्वामित्व में हैं। 13.5% झरने निजी स्वामित्व में हैं।
संसाधनों पर खतरे के लिए 3,508 झरनों का आकलन किया गया। इनमें 265 झरने यानी 7.6% खतरे में पाए गए।
मणिपुर में 34.5% झरनों पर खतरा
मणिपुर में 3,419 झरने पूरे साल बहने वाले, 457 मौसमी और 65 सूखे हैं। राज्य में 91.4% झरने सार्वजनिक स्वामित्व में हैं।
संसाधनों पर खतरे के लिए जिन झरनों का आकलन हुआ, उनमें 1,336 यानी 34.5% खतरे में पाए गए।
राज्य में स्थानीय लोग 3,127 झरनों का इस्तेमाल करते हैं। बाहरी लोग 634 झरनों और जंगली जानवर 113 झरनों का इस्तेमाल करते हैं।
ओडिशा में 1,957 झरने
ओडिशा में 1,568 झरने पूरे साल बहने वाले, 315 मौसमी और 74 सूखे हैं। करीब 96% झरने सार्वजनिक स्वामित्व में हैं।
राज्य के 99.2% झरने ग्रामीण इलाकों में हैं। संसाधनों पर खतरे के लिए 1,878 झरनों का आकलन किया गया।
इनमें 295 झरने यानी 15.7% खतरे में पाए गए।
दार्जिलिंग में 1,200 झरने
पश्चिम बंगाल में 1,686 झरने हैं। इनमें 1,568 ग्रामीण और 118 शहरी इलाकों में हैं।
दार्जिलिंग में 1,200 और कलिम्पोंग में 427 झरने दर्ज किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, इन जिलों के कई ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए झरने पीने के पानी का अहम स्रोत हैं।
गोवा में 61 झरनों पर खतरा
गोवा में 1,196 झरने मिले हैं। इनमें 1,105 पूरे साल बहने वाले, 66 मौसमी और 25 सूखे हैं।
इनमें 662 झरने सार्वजनिक और 509 निजी स्वामित्व में हैं। संसाधनों पर खतरे के लिए जिन झरनों का आकलन हुआ, उनमें 61 यानी 5.2% खतरे में हैं।
त्रिपुरा के धलाई में सबसे ज्यादा झरने
त्रिपुरा में 661 झरने पूरे साल बहने वाले, 378 मौसमी और 10 सूखे हैं। राज्य के सभी झरने ग्रामीण इलाकों में हैं।
सबसे ज्यादा 398 झरने धलाई में मिले। इसके बाद नॉर्थ त्रिपुरा में 238 और खोवाई में 205 झरने दर्ज किए गए।
असम में 792 झरने
असम में 792 झरने हैं। इनमें 587 ग्रामीण और 205 शहरी इलाकों में हैं। राज्य में 662 झरने पूरे साल बहने वाले, 127 मौसमी और तीन सूखे हैं।
संसाधनों पर खतरे के लिए 784 झरनों का आकलन किया गया। इनमें 41 यानी 5.2% खतरे में पाए गए।
असम में स्थानीय लोग 667 झरनों का इस्तेमाल करते हैं। बाहरी लोग 91 और जंगली जानवर 26 झरनों का इस्तेमाल करते हैं।
तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान का आंकड़ा
तेलंगाना में 148 झरने मिले हैं। इनमें 126 पूरे साल बहने वाले, 18 मौसमी और चार सूखे हैं।
आंध्र प्रदेश में 34 झरने मिले हैं और सभी ग्रामीण इलाकों में हैं। राज्य के सभी 34 झरने रिसाव वाले और मौसमी हैं। ये सभी सार्वजनिक स्वामित्व में हैं।
राजस्थान में 13 झरने मिले हैं। इनमें 10 ग्रामीण और तीन शहरी इलाकों में हैं। आठ झरने पूरे साल बहने वाले और पांच मौसमी हैं।
राजस्थान के सभी 13 झरने सार्वजनिक स्वामित्व में हैं।
20 करोड़ लोग झरने के पानी पर निर्भर
रिपोर्ट में पानी की सुरक्षा पर नीति आयोग के 2018 के वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। इसका नाम ‘इन्वेंटरी एंड रिवाइवल ऑफ स्प्रिंग्स इन द हिमालयाज फॉर वाटर सिक्योरिटी’ है।
इसके मुताबिक, देश की 15% आबादी यानी करीब 20 करोड़ लोग अपनी जरूरतों के लिए सीधे या परोक्ष रूप से झरने के पानी पर निर्भर हैं।
संसद की जल संसाधन संबंधी स्थायी समिति की 23वीं रिपोर्ट 2022-23 में भी पहाड़ी इलाकों के झरनों को फिर जीवित करने और टिकाऊ तरीके से संभालने की सिफारिश की गई थी।
समिति ने जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग से इस दिशा में कदम उठाने को कहा था।
इसके बाद विभाग ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र और दूसरे पहाड़ी इलाकों में झरना-क्षेत्र मैपिंग के लिए एक संचालन समिति बनाई। इसका मकसद झरना-क्षेत्र प्रबंधन का काम तेज करना था।
समिति ने झरनों और झरना-क्षेत्रों की मैपिंग के लिए व्यवस्थित व्यवस्था, एक जैसे फॉर्मेट और मानकीकृत तकनीकों की कमी को बड़ी बाधा बताया।
डिजिटल तरीके से हुआ सेंसस
पहली स्प्रिंग सेंसस 7वीं माइनर इरिगेशन सेंसस, दूसरी वाटर बॉडीज सेंसस और पहली मेजर एंड मीडियम इरिगेशन प्रोजेक्ट्स सेंसस के साथ की गई। इसका आधार वर्ष 2023-24 था।
यह पूरी प्रक्रिया डिजिटल तरीके से हुई। डेटा एंड्रॉयड आधारित मोबाइल ऐप के जरिए जुटाया गया और केंद्रीय वेब प्लेटफॉर्म पर संभाला गया।
रिपोर्ट के साथ दिए संदेश में जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने कहा कि झरनों के प्रबंधन के लिए व्यवस्थित डेटाबेस और समय-समय पर निगरानी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि इससे झरना संसाधनों का प्रबंधन, झरना-क्षेत्र प्रबंधन परियोजनाएं और झरना प्रणालियों की वैज्ञानिक समझ आगे बढ़ेगी।
यह रिपोर्ट शामिल किए गए 10 राज्यों में झरना-क्षेत्र प्रबंधन से जुड़े कामों की योजना बनाने और उन्हें लागू करने के लिए नीति-निर्माताओं और कार्यान्वयन एजेंसियों के संदर्भ दस्तावेज के तौर पर तैयार की गई है।

