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JDU बैठक में क्यों दिखी गुटबाजी-निशांत कैसे संभाल रहे कमान:पार्टी की बैठक में नहीं आए ललन सिंह, कुछ विधायक भी नहीं पहुंचे; पढ़िए इनसाइड




अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच चल रही तनातनी के बीच शुक्रवार को जदयू विधानमंडल दल की बैठक हुई। इसमें पार्टी के विधायकों और विधान पार्षदों को बुलाया गया था, लेकिन अनंत सिंह नहीं आए। कुछ अन्य विधायक भी शामिल नहीं हुए। सांसद व केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की अनुपस्थिति भी चर्चा में रही। इस बीच गौर करने वाली बात यह रही कि मंच का संचालन पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बेटे व मंत्री निशांत कुमार ने की। निशांत ने पार्टी को नीतीश कुमार की विचारधारा पर चलाने की बात कही। बैठक जदयू में एकजुटता दिखाने के लिए बुलाई गई थी। इसके साथ ही यह संदेश दिया गया कि पार्टी की कमान निशांत के हाथों में है। जदयू की बैठक के क्या मायने हैं? निशांत ने क्या संदेश दिया? अनंत सिंह और नीरज कुमार के टकराव के बीच पार्टी में एकजुटता के लिए क्या कहा? 5 पॉइंट में पढ़िए JDU की बैठक की इनसाइड। 1- निशांत ने मंच संभाला, दिया सबसे बड़ा संदेश बैठक में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक तस्वीर निशांत कुमार को लेकर बनी। पार्टी के विधायकों और विधान पार्षदों के सामने उन्होंने अपनी बात रखी। पार्टी की नीति और दिशा को नीतीश कुमार के विचारों से जोड़ते हुए कहा कि जदयू उनकी नीति और विचारधारा के साथ आगे बढ़ेगी। उनके संबोधन का केंद्रीय संदेश यह था कि गठबंधन अपनी जगह है, लेकिन जदयू की राजनीतिक पहचान और उसकी नीतियां अपनी जगह हैं। यही बात इस बैठक को सामान्य प्रशिक्षण कार्यक्रम से अलग करती है। निशांत को पार्टी के विधायकों के सामने बोलने का मंच मिला। उन्होंने नीतीश कुमार के कामकाज और बिहार में पिछले करीब दो दशकों के विकास को सामने रखा। क्या इसका मतलब है निशांत को अगला नेता घोषित कर दिया गया? इसकी औपचारिक घोषणा तो नहीं हुई, लेकिन उन्हें लगातार राजनीतिक गतिविधियों में आगे लाया जाना और विधायकों के बीच संबोधन का अवसर मिलने से ऐसा संदेश दिया गया है। पार्टी में उनकी राजनीतिक भूमिका पहले की तुलना में अधिक सक्रिय हुई है। कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी में निशांत को बैठक को संबोधित करने का मौका दिया गया। पार्टी का मैसेज क्लीयर है। नेतृत्व निशांत कुमार के हाथों में जाएगा। 2- ललन सिंह नहीं आए, 24 विधायकों ने पूछा सवाल यह बैठक ऐसे समय हुई जब जदयू में टूट की बातें चर्चा में हैं। कहा जा रहा है कि पार्टी में दो धड़े बन रहे हैं। ललन सिंह के नहीं आने से इन चर्चाओं को बल मिला। बिजेंद्र यादव समेत कुछ सीनियर नेता भी नहीं आए थे। बैठक में मौजूद नेताओं के बीच वरिष्ठ नेताओं की गैरमौजूदगी को लेकर सवाल उठे। जदयू विधायक पंकज मिश्रा के मुताबिक, करीब 24 विधायक खड़े हुए और सवाल किया कि केंद्रीय मंत्री ललन सिंह बैठक में क्यों नहीं हैं। ललन सिंह की गैरमौजूदगी पर पार्टी की ओर से सफाई दी गई कि बैठक विधानमंडल दल के विधायकों और विधान पार्षदों का था। सांसदों को इसमें नहीं बुलाया गया था। वरिष्ठ नेताओं के समझाने पर मामला शांत हुआ। 3- हावी रहा अनंत सिंह-नीरज कुमार तनातनी मामला जदयू की बैठक में अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच तनातनी का मुद्दा हावी रहा। बैठक वाले दिन ही दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर तीखा हमला किया। अनंत सिंह बैठक में नहीं पहुंचे। उन्होंने मीडिया से बातचीत में नीरज कुमार पर गंभीर आरोप लगाए। दावा किया कि उनके गांव वाले घर में AK-47 रखवाकर उन्हें फंसाने में नीरज कुमार की भूमिका थी। नीरज कुमार ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि अगर कोई प्रमाण है तो उन्हें कोर्ट में जाना चाहिए। अनंत सिंह ने यह भी कहा कि वह नीरज कुमार के खिलाफ हैं। उन्हें हराने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे। नीरज कुमार की जमानत जब्त हो जाएगी। सुलह की संभावना पर अनंत सिंह ने साफ कहा कि अब कुछ नहीं होगा। पुराने विवाद का जिक्र करते हुए नीरज के नार्को टेस्ट की मांग कर दी। नीरज कुमार ने भी पलटवार किया। उन्होंने कहा, ‘बहुत लोग हमारे ऊपर आरोप लगा रहे हैं। अरे हम तो अपराधियों के लिए कहर हैं। गंगा में घुसकर भी कोई कहेगा तो लोग नहीं मानेंगे।’ नार्को टेस्ट करवाने की बात पर नीरज ने कहा.. बैठक में अनंत सिंह के शामिल नहीं होने को लेकर मीटिंग के बाद पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि क्षेत्र में ज्यादा जरूरी काम है, इसलिए नहीं आए। अनंत सिंह की गैरमौजूदगी को सिर्फ क्षेत्र में जरूरी काम बताकर टाला जा सकता है, लेकिन उसी दिन उनका नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर बोलना अलग राजनीतिक संदेश देता है। खास बात यह है कि कुछ दिन पहले भी नीरज कुमार और अनंत सिंह के बीच विवाद सुलझाने की कोशिश हुई थी। इसके बावजूद अनंत अपने रुख से पीछे नहीं हटे। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र को लेकर निशांत कुमार भी विधायकों और सांसदों के साथ संपर्क में हैं। यानी विवाद अब सिर्फ दो नेताओं का व्यक्तिगत टकराव नहीं रह गया है। इसका असर विधान परिषद चुनाव और पार्टी के अंदर के समीकरणों पर भी देखा जा रहा है। 4- जदयू में फूट की चर्चा के बीच एकजुटता का मैसेज देने की कोशिश अनंत सिंह और नीरज कुमार जिस तरह खुलकर एक-दूसरे पर हमला कर रहे हैं, उससे चर्चा है कि इन्हें पार्टी के बड़े नेताओं का सपोर्ट है। निशांत कुमार ने दोनों को मनाने की कोशिश की, लेकिन बयानबाजी नहीं रुकी। सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पार्टी में गुटबाजी बढ़ी है। एक चर्चा तो केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और संजय झा के बीच को-ऑर्डिनेशन नहीं बनने की हो रही है। हालांकि पार्टी के नेता इसे खारिज करते हैं, लेकिन दोनों की एक्टिविटी इस बात को बल देती है। एक तरफ जहां संजय झा फरक्का जल संधि के मुद्दे पर एग्रेसिव हैं। बिहार के अलग-अलग जिलों में सभा कर रहे हैं। वहीं, इस मुद्दे पर ललन सिंह पूरी तरह खामोश हैं। वे बाढ़ पर तो बयान देते हैं, लेकिन जदयू के इस बड़े मुहिम पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। हालांकि आधिकारिक तौर पर पार्टी के भीतर किसी तरह की कंट्रोवर्सी की बात सामने नहीं आई है। जदयू की बैठक में नीतीश कुमार की विचारधारा पर आगे बढ़ने की बात कहकर पार्टी में एकजुटता का मैसेज देने की कोशिश की गई। 5- NDA के लिए जदयू की बैठक के मायने बैठक का एक और राजनीतिक संदेश NDA के लिए दिखाई दिया। प्रबोधन कार्यक्रम में बिहार के विकास का प्रेजेंटेशन दिया गया। 2005 से 2026 तक के बिहार के विकास, आर्थिक वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर, कृषि और उद्योग जैसे विषयों पर चर्चा हुई। निशांत कुमार ने बिहार में हुए विकास को नीतीश कुमार के कामकाज से जोड़ा। विकास की चर्चा का राजनीतिक केंद्र नीतीश कुमार और जदयू का शासन मॉडल रहा। इस पूरे नैरेटिव में एनडीए सरकार के मौजूदा साझेदार बीजेपी के कामकाज को प्रमुखता नहीं मिली। इस बैठक का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि हाल के दिनों में UCC को लेकर जदयू और बीजेपी के बीच अलग-अलग रुख सामने आए हैं। इसी बीच राजद की ओर से सरकार बनाने का दावा और जदयू को साथ आने का राजनीतिक संदेश भी दिया गया। ऐसे माहौल में जदयू का अपने विधायकों और विधान पार्षदों को एक जगह बुलाना सिर्फ प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं माना जा सकता। राजनीतिक तौर पर इसे विधायकों की राय और पार्टी की आंतरिक स्थिति को समझने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है।



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