Bihar Flood Relief Crisis | Patna Victims Complain Poor Food Quality


‘यहां खाना का कोई टाइम टेबल नहीं है। कभी समय पर खाना मिलता है तो कभी काफी देर हो जाती है। सरकारी स्कूल में जो खाना बनता है, उससे भी बेकार खाना हम लोग को मिलता है।’

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यह कहना है बाढ़ पीड़ित मनीष कुमार का। वह पिछले 10 दिनों से पटना के मरीन ड्राइव पर जनार्दन घाट के पास बने राहत शिविर में रह रहे हैं। यहां कम्युनिटी किचन में बन रहे खाने के सहारे लोगों को दो टाइम भोजन दिया जा रहा है, जिसमें दाल-चावल और सब्जी शामिल है।

बिहार के 15 जिलों में करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। इनके लिए राज्य के विभिन्न जिलों में 1248 कम्युनिटी किचन चलाई जा रही हैं। प्रभावित परिवारों के बीच अब तक करीब 3.98 लाख पॉलीथीन शीट और 72,800 ड्राई राशन पैकेट बांटे गए हैं।

घर-बार छोड़कर राहत शिविर में रह रहे बाढ़ पीड़ितों को मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझना पड़ रहा हैं। पीड़ितों का कहना है कि शिविर में दो वक्त चावल-दाल तो मिल रहा है, लेकिन भोजन का कोई निर्धारित समय नहीं है। कई बार खाना इतना खराब होता है कि उसे खाने के बजाय भूखे सोना पसंद करते हैं। बिहार के कम्युनिटी किचन से ग्राउंड रिपोर्ट पढ़िए…

पटना के मरीन ड्राइव पर चल रहे कम्युनिटी किचन में दोनों वक्त दाल-चावल खिलाया जा रहा है।

पटना के मरीन ड्राइव पर चल रहे कम्युनिटी किचन में दोनों वक्त दाल-चावल खिलाया जा रहा है।

खाने के मेन्यू में दाल-चावल और सब्जी, शनिवार को मिलता है खिचड़ी-चोखा

पटना में मरीन ड्राइव पर दो जगह कम्युनिटी किचन बनाया गया है। एक एलसीटी घाट के पास और दूसरा मीनार घाट के पास है। एलसीटी घाट के किचन में रोज करीब 3000-4000 लोगों का खाना बनता है। यहां बिंद टोली के लोग विस्थापित होकर रह रहे हैं। खाना बनने के बाद लोग बर्तन लेकर आते हैं और खाना लेकर जाते हैं। यहां सुबह 10 बजे और शाम को 7 बजे से खाना मिलना शुरू हो जाता है।

वहीं, जनार्दन घाट के पास बने कम्युनिटी किचन में लोगों के बैठकर खाने की व्यवस्था की गई है। यहां भी करीब 3000 लोगों का खाना सुबह-शाम बनता है। खाने की टाइमिंग दिन में 12-2 बजे और रात में 8-10 बजे है। जब तक लोग आते रहते हैं, खाना मिलता है। दोनों जगह पर खाने के मेन्यू में दाल-चावल और सब्जी शामिल है। वहीं, शनिवार को खिचड़ी और चोखा मिलता है।

स्थानीय लोग बोले-मिड-डे मील से भी खराब खाना मिलता है

शिविर में रह रहे मनीष कुमार ने बताया, ‘कुछ दिन पहले सीएम सम्राट चौधरी के शिविर में आने का कार्यक्रम था। उसी समय पंखा और लाइट की व्यवस्था की गई थी। इससे पहले शिविर में न तो पर्याप्त रोशनी थी और न ही गर्मी से राहत के लिए पंखे लगे थे। सोने के लिए बिस्तर की भी व्यवस्था नहीं थी। लोग जमीन पर गमछा या कपड़ा बिछाकर रात गुजारते थे।’

पटना के जनार्दन घाट के पास बने कम्युनिटी किचन में रोज करीब 3 हजार लोगों के लिए खाना बनता है।

पटना के जनार्दन घाट के पास बने कम्युनिटी किचन में रोज करीब 3 हजार लोगों के लिए खाना बनता है।

कभी कच्चा, तो कभी गीला मिलता है चावल

बाढ़ पीड़ित सुगमिया देवी ने सामुदायिक रसोई में मिलने वाले भोजन की स्थिति बताते हुए कहा, ‘खाना बनाने वाले अगर मन लगाकर भोजन तैयार नहीं करेंगे तो उसकी गुणवत्ता कैसी होगी, यह समझा जा सकता है। कभी भात सही रहता है, कभी गीला होता है, तो कभी कच्चा रह जाता है।’

दाल और चावल में कोई दोस्ती नहीं, पत्तल पर डालते ही बह जाती

शिविर में 10 दिनों से रह रहे विजेन्द्र कुमार ने बताया, ‘कम्युनिटी किचन से दो वक्त भोजन मिलता है, लेकिन उसकी क्वालिटी संतोषजनक नहीं है। यहां दाल और चावल में कोई दोस्ती ही नहीं है। दाल इतनी पतली होती है कि पत्तल पर डालते ही बह जाती है।’

ढाई घंटे तक बर्तन लेकर आए लोगों की रहती है भीड़

पटना के मरीन ड्राइव में LCT घाट के पास कम्युनिटी किचन के संचालक इरफान आफताब ने कहा, ‘बाढ़ पीड़ितों को दो टाइम खाना मिलता है। खाना बनने के बाद लोग अपना बर्तन लेकर खाना लेने आते हैं। ढाई घंटे तक यहां काफी भीड़ रहती है।’

‘सुबह का खाना बांटने के बाद बर्तन धोते हैं फिर शाम का खाना बनाने में लग जाते हैं। एक दिन में 24 बोरा चावल लगता है। दाल चावल के साथ आलू-भिंडी, आलू-सोयाबीन, आलू-कद्दू, आलू-परवल जैसी सब्जियां दी जाती है। हम लोग कोशिश करते हैं कि हर बार अलग-अलग सब्जियां बनाए ताकि खाने का स्वाद बना रहे।’

इरफान ने कहा, ‘इस कम्युनिटी किचन में हम लोग 3000-3500 लोगों के लिए खाना बनाते हैं। यहां अधिकतर बिंद टोली के लोग हैं। वे अपना खाना बर्तन में लेकर जाते हैं। यहां बैठकर खाने वाले बहुत कम ही आदमी है। यहां पानी की भी व्यवस्था नगर निगम ने कराई है। एक बार में तीन टैंकर का इस्तेमाल होता है।’

2 सितंबर से सिर्फ चावल खा रहे हैं

सुनील कुमार ने बताया, ‘मैं 2 सितंबर से शिविर में रह रहा हूं। दोनों वक्त केवल चावल ही खाने को मिल रहा है। सरकार को कभी-कभी रोटी, पूड़ी या दूसरी चीजें भी देनी चाहिए। चावल खाने लायक है, लेकिन लगातार चावल खाने से कई लोगों को गैस और पेट संबंधी परेशानी हो रही है।’

‘शिविर में छोटे बच्चों के लिए दूध और बिस्किट की कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। कुछ दवाइयां जरूर मिलती हैं, लेकिन बच्चों की पोषण संबंधी जरूरतों का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। मेरे पास गाय है। उसका दूध बच्चों को देता हूं। जिन लोगों के पास पशु नहीं हैं वे किसी तरह दूध खरीदकर बच्चों को देते हैं।’

कभी दाल पतली तो कभी कच्ची मिलती है सब्जी

शिविर में रह रहे राज कुमार ने कहा कि दोनों वक्त भात ही दिया जा रहा है। खाना खाने लायक है। अगर कभी भोजन में कोई गड़बड़ी होती है तो शिविर में रह रहे लोग इसकी शिकायत करते हैं।

वहीं, मोताब राज ने कहा कि कभी दाल में नमक कम तो कभी पतली रह जाती है। लगता है जैसे दाल में पानी ही पानी है। इसी तरह सब्जी भी कभी-कभी कच्ची मिलती है। चावल आमतौर पर सही तरीके से पका हुआ रहता है। हर समय चावल खाना संभव नहीं है। अगर कभी पूड़ी या रोटी मिल जाए तो लोगों को अच्छा लगेगा।

पटना के एलसीटी घाट के कम्युनिटी किचन में बाढ़ प्रभावित बर्तन लेकर आते हैं और खाना ले जाते हैं।

पटना के एलसीटी घाट के कम्युनिटी किचन में बाढ़ प्रभावित बर्तन लेकर आते हैं और खाना ले जाते हैं।

सुबह 6 बजे से ही खाना पकाने में लग जाते आदमी

मरीन ड्राइव पर जनार्दन घाट के पास कम्युनिटी किचन चला रहे संचालक एम एच कुरैशी ने कहा, ‘करीब 3000 लोगों के लिए यहां खाना बनता है। रात में सारा काम निपटाने के बाद सुबह 6 बजे से हमारे लोग खाना पकाने में लग जाते हैं। हर दिन दाल-चावल के साथ सब्जी दी जाती है। शनिवार को खिचड़ी और चोखा देते हैं। शाम में 8 बजे से खाना शुरू हो जाता है। रात 12 बजे तक भी हम खिलाते हैं।’

उन्होंने कहा, ‘नकटा दियारा में रोजाना हम लोगों को चूड़ा और चना पहुंचते हैं। शिविर में दो टाइम का खाना खिलाते हैं। सरकार की ओर से यहां पर सभी व्यवस्था की गई है। सोने के लिए बेड, बैठने के लिए कुर्सी, बुफे सिस्टम के साथ बैठकर खाना खाने की व्यवस्था है।’

मेडिकल कैंप में 1 दिन में 150 मरीज आ रहे हैं

बाढ़ पीड़ितों के राहत के लिए यहां पर मेडिकल कैंप भी लगाया गया है। यहां खांसी, बुखार, सर्दी, खुजली, पेट दर्द और लूज मोशन की दवाइयों के साथ टेटनस की सुई भी उपलब्ध की गई है।

मेडिकल कैंप में बैठे चिकित्सा पदाधिकारी डॉ अजय कुमार गुप्ता ने कहा कि लोग गंदे पानी में जा रहे हैं, जिससे उन्हें खुजली हो रही है। सबसे ज्यादा शिकायत खुजली की ही आ रही है। 1 दिन में करीब 150 मरीज कैंप में आ जा रहे हैं। तीन शिफ्ट में मेडिकल कैंप में कर्मचारी तैनात किए गए हैं।

जानवरों के लिए भी मेडिकल कैंप लगाया गया है। डॉ मुकुल कुमार ने कहा कि यहां जानवरों के फीवर, डायरिया, भूख की दवाई के साथ पशु चारा की भी व्यवस्था है। बाढ़ के समय में जानवरों को लेकर सबसे ज्यादा शिकायत भूख नहीं लगे और डायरिया की आ रही है। हर दिन 80 से ज्यादा जानवरों के बीमार होने की शिकायत आ जाती है।

अब पढ़िए, भागलपुर से वैशाली तक बाढ़ प्रभावित 7 जिलों में सामुदायिक रसोई का हाल

समस्तीपुर: जिले के तीन प्रखंडों में 2.33 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं। प्रभावित लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए प्रशासन की ओर से 121 कम्युनिटी किचन चलाए जा रहे हैं।

प्रशासन का दावा है कि प्रत्येक कम्युनिटी किचन में रोजाना एक हजार से अधिक लोग भोजन कर रहे हैं। किचन तक पहुंचने वाले हर बाढ़ पीड़ित को पर्याप्त मात्रा में चावल, दाल और एक सब्जी उपलब्ध कराई जा रही है।

हालांकि, प्रशासन के दावों से अलग जमीनी हकीकत कुछ और नजर आई। बाढ़ प्रभावित लोगों को तीन-तीन किलोमीटर तक नाव से सफर कर कम्युनिटी किचन पहुंचना पड़ रहा है। घर के पुरुष और बच्चे तो किसी तरह किचन तक पहुंच रहे हैं, लेकिन महिलाएं वहां नहीं पहुंच पा रही हैं। उन्हें घर पर ही किसी तरह भोजन का इंतजाम करना पड़ रहा है।

समस्तीपुर में बाढ़ पीड़ितों के लिए 121 कम्युनिटी किचन चलाए जा रहे हैं।

समस्तीपुर में बाढ़ पीड़ितों के लिए 121 कम्युनिटी किचन चलाए जा रहे हैं।

भागलपुर: बाढ़ से जिले के करीब 8.56 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। बाढ़ के कारण घर छोड़ने को मजबूर लोगों को सामुदायिक रसोई से खाना मिल रहा है। जिले में 300 से ज्यादा सामुदायिक रसोई चल रहे हैं।

बेगूसराय: जिले के 8 प्रखंडों‎ के करीब ‎3.80 लाख लोग बाढ़ से सीधे तौर पर प्रभावित‎ हुए हैं। इन लोगों को दोनों वक्त खाना खिलाने के लिए सामुदायिक रसोई चलाए गए। गंगा नदी के जलस्तर में कमी के बाद मटिहानी प्रखंड में चलाए जा रहे 12 सामुदायिक रसोई केंद्रों को बंद कर दिया गया है।

कटिहार: जिले में गंगा, कोसी, बरांडी और कारी कोसी नदियों‎के उफान से बाढ़ की स्थिति विकराल बनी हुई है। करीब 8.80 लाख लोग ‎प्रभावित हुए हैं। बाढ़ पीड़ितों को भोजन देने के लिए 426 सामुदायिक रसोई‎ केंद्र चलाए जा रहे हैं।

मुंगेर: जिले के 3 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित‎ हुए हैं। प्रभावित क्षेत्रों में‎ 79 स्थानों पर सामुदायिक रसोई संचालित की‎ जा रही है। प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार अब‎तक करीब 6 लाख लोगों को सामुदायिक रसोई के ‎माध्यम से भोजन उपलब्ध कराया गया है।

वैशाली: जिले के करीब 3 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। बाढ़ पीड़ितों को दोनों वक्त खाना देने के लिए 24 सामुदायिक रसोई चलाए जा रहे हैं।

खगड़िया: जिले के 1.63 लाख लोग बाढ़ प्रभावित हैं। इसके लिए 50 सामुदायिक रसोई चलाए जा रहे हैं। बाढ़ की स्थिति में अब धीरे-धीरे सुधार होने लगा है। कई इलाकों में पानी का स्तर कम हो रहा है।



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