2 घंटे पहले
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रविवार, 25 अक्टूबर और सोमवार 26 अक्टूबर को आश्विन मास की अंतिम तिथि यानी पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) है। इस तिथियों की घट-बढ़ की वजह से शरद पूर्णिमा दो दिन रहेगी। 25 तारीख की सुबह करीब 11:55 बजे से यह तिथि शुरू होगी और 26 तारीख की सुबह करीब 9:41 बजे खत्म होगी। शरद पूर्णिमा पर रात में चंद्र की रोशनी में खीर रखने की परंपरा है, इसलिए 25 अक्टूबर की रात ये परंपरा निभाई जानी चाहिए, क्योंकि इसी रात में पूर्णिमा तिथि रहेगी।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात देवी लक्ष्मी स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर आती हैं और पृथ्वी पर विचरण करती हैं। महालक्ष्मी देखती हैं कि इस तिथि की रात में कौन जागकर पूजा-पाठ कर रहा है। संस्कृत शब्द को जागर्ति यानी कौन जाग रहा है? इस शब्द से ही आश्विन पूर्णिमा का एक नाम कोजागरी पूर्णिमा पड़ा। जो लोग रात में जागकर लक्ष्मी पूजन करते हैं, उन पर मां लक्ष्मी की विशेष कृपा रहती है।
भगवान श्रीकृष्ण के महारास की मान्यता- पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की चांदनी में ही वृंदावन की गोपियों के संग महारास रचाया था। ऐसा कहा जाता है कि इस रात में भगवान श्रीकृष्ण ने माया के बल से अनेक रूप धारण किए और वृंदावन की सभी गोपियों के साथ रास रचाया। भगवान की इस लीला के कारण शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
शरद पूर्णिमा से जुड़ी परंपराएं
चंद्र की रोशनी में खीर रखने की परंपरा- शरद पूर्णिमा की रात गाय के दूध, चावल, सूखे मेवे और शक्कर से बनी खीर को घर के बाहर खुले आसमान के नीचे चंद्र की रोशनी में रखा जाता है। कई लोग चंद्र की रोशनी में ही खीर पकाते हैं। माना जाता है कि इस पूर्णिमा की रात चंद्र अपनी पूरी 16 कलाओं के साथ उदित होता है और चंद्र की किरणों में औषधीय और अमृत तत्व के गुण रहते हैं। इस रात घर के बाहर रखी गई खीर में चंद्र की किरणों के गुण उतर आते हैं, ये गुण हमारी सेहत के लिए लाभदायक होते हैं।
चंद्र की रोशनी में कुछ देर खीर रखने के बाद इस खीर का भोग महालक्ष्मी को लगाया जाता है। लक्ष्मी पूजन किया जाता है। पूजा के प्रसाद के रूप में यह खीर खाई जाती है।
शरद पूर्णिमा पर कर सकते हैं ये शुभ काम
- इस दिन शाम को महालक्ष्मी और भगवान विष्णु का विधि-विधान से पूजन किया जाता है।
- घर में पूजा स्थल और मुख्य द्वार पर दीपक जलाए जाते हैं। आंगन में तुलसी के पास भी दीपक जलाते हैं।
- रात में भजन-कीर्तन, श्रीसूक्त का पाठ और जागरण करने की परंपरा है।
- इस तिथि पर भगवान सत्यनारायण की कथा सुनने और व्रत रखने का विशेष महत्व है।
- अगले दिन सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान किया जाता है। अगर नदी में स्नान करना संभव न हो, तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं।
- इस दिन अन्न, वस्त्र, धन और खीर का दान खासतौर पर करना चाहिए।
- शरद पूर्णिमा की रात कुछ समय चंद्र को एकटक देखने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। ऐसी मान्यता है। माना जाता है कि शरद ऋतु में शरीर में पित्त दोष बढ़ता है। ठंडी चांदनी में रखी खीर का सेवन करने से शरीर में पित्त का संतुलन ठीक होता है।

