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बक्सर में 45 फीट रावण, 10 सिर-मुकुट से बरसेगी आग:पूरे शरीर में कोल्ड फायर; 13 साल से पुतले बना रहे जितेंद्र; 50 हजार तक पहुंचता है बजट




आज मंगलवार को विजयदशमी मनाया जा रहा है। इस मौके पर बक्सर के ऐतिहासिक किला मैदान में इस बार 45 फीट ऊंचे रावण और 40 फीट ऊंचे मेघनाथ के पुतले जलाए जाएंगे। रावण का दहन खास होने वाला है। उसके दस सिर और मुकुट से फुलझड़ी जैसी आग की फुहार निकलेगी। पुतले के पूरे शरीर में कोल्ड फायर और स्मोक फायर की व्यवस्था की गई है। दहन से करीब पांच मिनट पहले आतिशबाजी शुरू होगी। इसके बाद रंगीन धुएं का नजारा दिखने को मिलेगा। इन पुतलों को बक्सर के मिश्रवलिया गांव के रहने वाले जितेंद्र शर्मा और उनका परिवार तैयार किया है। जितेंद्र पिछले 13 साल से रावण के पुतले बना रहे हैं। पिछले छह साल से उन्हें बक्सर के किला मैदान में रावण बनाने की जिम्मेदारी मिल रही है। उनका कहना है कि पुतले बनाने का काम उनके लिए पेशा नहीं, बल्कि शौक है। वह साल के करीब 10 महीने एसी की मरम्मत करते हैं और दशहरे के आसपास एक महीने तक इसी कला को समय देते हैं। रावण के दस सिर और मुकुट से निकलेगी आग की फुहार इस बार रावण के पुतले में आतिशबाजी का खास इंतजाम किया गया है। जितेंद्र शर्मा के मुताबिक, पुतले के दस सिर और मुकुट से कोल्ड फायर निकलेगा। इससे करीब एक मिनट तक फुलझड़ी जैसी आग की फुहार दिखाई देगी। इसके साथ ही पुतले में स्मोक फायर भी लगाया जा रहा है, जिससे रंगीन धुएं का नजारा बनेगा। जितेंद्र बताते हैं, इस बार पुतले के केवल एक हिस्से में नहीं, बल्कि पूरे शरीर में कोल्ड फायर और स्मोक फायर की व्यवस्था करने की प्लैनिंग है। दहन से करीब पांच मिनट पहले आतिशबाजी शुरू की जाएगी। पुतले के हाथों में भी ऐसी व्यवस्था की जाएगी, जिससे आग की फुहार निकलती दिखाई दे। रावण के स्वरूप को भी खास तरीके से तैयार किया गया है। उसके हाथ में धनुष-बाण है। पहनावे में पारंपरिक धोती की जगह पजामे और लंबे कुर्ते जैसा लुक दिख रहा है। पुतले की बनावट, कपड़ों और आतिशबाजी को मिलाकर उसे आकर्षक रूप देने की कोशिश की गई है। इस तरह किला मैदान में रावण दहन के दौरान ऊंचे पुतले के साथ रोशनी, आग की फुहार और रंगीन धुएं का नजारा देखने को मिला। हालांकि, आतिशबाजी के इस्तेमाल और दहन के दौरान सुरक्षा इंतजामों की जिम्मेदारी आयोजन समिति और संबंधित प्रशासन की होगी। पिछले साल से पांच-पांच फीट छोटे हैं रावण-मेघनाथ इस बार किला मैदान में रावण और मेघनाथ के पुतलों की ऊंचाई पिछले साल के मुकाबले कम रखी गई है। पिछले साल रावण 50 फीट और मेघनाथ 45 फीट ऊंचे थे। इस बार रावण की ऊंचाई 45 फीट और मेघनाथ की 40 फीट रखी गई है। जितेंद्र शर्मा के मुताबिक, बड़े पुतलों को तैयार करने के बाद मैदान में खड़ा करना सबसे मुश्किल काम होता है। कई बार क्रेन उपलब्ध नहीं होने या दूसरे तकनीकी कारणों से उन्हें सीधा खड़ा करने में परेशानी आती है। पुतले की ऊंचाई जितनी ज्यादा होती है, उसे संभालने और सुरक्षित तरीके से खड़ा करने में उतनी ही सावधानी बरतनी पड़ती है। इसी को ध्यान में रखते हुए इस बार दोनों पुतलों की ऊंचाई पांच-पांच फीट कम रखी गई है। इससे उन्हें मैदान में खड़ा करने में आसानी होगी। पुतलों को तैयार करने के साथ उनकी मजबूती और संतुलन का भी ध्यान रखा जा रहा है, ताकि दहन से पहले वे ठीक से खड़े रह सकें। दिल्ली में सीखी कला, गुरु हरदेव सिंह ने सिखाया पुतला बनाना जितेंद्र शर्मा का रावण बनाने का सफर दिल्ली से शुरू हुआ। उनके पिता रेलवे में नौकरी करते थे। इस वजह से बचपन में वह अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते थे। वहां रेलवे कॉलोनी में रामलीला के लिए रावण के पुतले तैयार किए जाते थे। जितेंद्र उन कारीगरों को पुतले बनाते हुए देखते थे। धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी इस काम में बढ़ने लगी। जितेंद्र के मुताबिक, दिल्ली में हरदेव सिंह नाम के एक कारीगर उनके गुरु थे। उन्होंने ही जितेंद्र को रावण का पुतला बनाना सिखाया। पुतले का ढांचा तैयार करने, बांस और तार का इस्तेमाल करने, कपड़े लगाने और उसे आकर्षक स्वरूप देने की बारीकियां उन्होंने अपने गुरु से सीखीं। वह बताते हैं कि शुरुआत में पुतले बनाने का काम उनके लिए नया था। प्रैक्टिस के साथ हाथ साफ होता गया और वह पहले से बड़े पुतले तैयार करने लगे। दिल्ली में सीखी कला को वह अपने साथ बिहार ले आए। गांव से शुरुआत, अब बक्सर के किला मैदान तक पहुंचा काम जितेंद्र शर्मा ने करीब 13 साल पहले रावण के पुतले बनाने शुरू किए थे। शुरुआती दिनों में वह आसपास के गांवों के लिए पुतले तैयार करते थे। उस समय करीब 30 फीट के पुतले बनाए जाते थे। चौसा में काम मिलने के बाद उन्होंने अपने गांव में भी पुतले तैयार किए। कुछ साल तक इसी तरह गांवों में रावण बनाने का काम चलता रहा। धीरे-धीरे उनके काम की पहचान बढ़ी और बक्सर के किला मैदान के लिए भी पुतला बनाने का अवसर मिला। पिछले छह साल से वह किला मैदान के लिए रावण तैयार कर रहे हैं। यहां पुतला बनाने की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके काम का दायरा बढ़ा और आसपास के कई इलाकों से ऑर्डर मिलने लगे। जितेंद्र के लिए यह केवल पुतला बनाने का काम नहीं है। वह इसे अपनी सीखी हुई कला को आगे बढ़ाने का जरिया मानते हैं। हर साल वह पुतले की बनावट और सजावट में कुछ नया करने की कोशिश करते हैं। इस बार कोल्ड फायर और स्मोक फायर की व्यवस्था उसी कोशिश का हिस्सा है। बक्सर समेत छह जगहों के लिए तैयार किए पुतले इस साल जितेंद्र शर्मा को बक्सर के अलावा आसपास की कई जगहों के लिए रावण के पुतले बनाने का काम मिला था। कुल छह जगहों के लिए पुतले तैयार किए गए हैं। इनमें चौसा, चुन्नी, अखौरीपुर गोला, मिश्रवलिया और आसपास के दूसरे गांव शामिल हैं। किला मैदान के लिए 45 फीट का रावण और 40 फीट का मेघनाथ बनाया गया है। अन्य जगहों के लिए करीब 30 से 35 फीट तक के रावण तैयार किए गए हैं। छोटे पुतलों की ऊंचाई और बनावट संबंधित आयोजन की जरूरत के हिसाब से रखी जाती है। सभी पुतलों को समय पर संबंधित जगहों तक पहुंचाना भी काम का अहम हिस्सा है। बड़े पुतलों को ले जाने के लिए ट्रैक्टरों का इस्तेमाल किया जाएगा। पुतलों के आकार के कारण उन्हें ले जाते समय सावधानी रखनी पड़ती है, ताकि उनका ढांचा और सजावट खराब न हो। 25 से 30 हजार रुपए तक आती है बड़े पुतले की लागत जितेंद्र शर्मा के मुताबिक, 25 से 30 फीट तक के रावण का पुतला बनाने के लिए करीब 15 हजार रुपए तक मिलते हैं। वहीं, किला मैदान जैसे बड़े आयोजन के लिए तैयार किए जाने वाले पुतले की लागत करीब 25 हजार रुपए से शुरू होती है। अगर सजावट और डिजाइन पर अधिक खर्च किया जाए, तो लागत 50 हजार रुपए तक पहुंच सकती है। उनका कहना है कि पुतले के आकार के साथ उसकी सजावट और आतिशबाजी की व्यवस्था भी खर्च बढ़ाती है। बांस, तार, कागज, कपड़े और दूसरे सामान के अलावा पुतले को आकर्षक बनाने में समय और मेहनत लगती है। इसके बावजूद कई बार मेहनत के हिसाब से कीमत नहीं मिल पाती। जितेंद्र बताते हैं कि बेहतर सजावट और डिजाइन के लिए अधिक खर्च की जरूरत होती है, लेकिन सीमित बजट के कारण हर बार वैसा कर पाना संभव नहीं होता। वह चाहते हैं कि पुतलों की बनावट और सजावट को और बेहतर बनाया जाए, लेकिन इसके लिए उचित कीमत मिलना जरूरी है। दशहरे पर एक महीने पुतले बनाने में लगाते हैं समय जितेंद्र शर्मा का मुख्य पेशा एसी की मरम्मत करना है। वह गोदरेज सर्विस सेंटर से जुड़े हैं और साल के करीब 10 महीने इसी काम में व्यस्त रहते हैं। दशहरे का समय नजदीक आने पर वह एसी का काम कम कर देते हैं और रावण के पुतले बनाने में जुट जाते हैं। उनके मुताबिक, यह काम उनके लिए कमाई का मुख्य जरिया नहीं है। वह इसे अपने शौक और कला के रूप में देखते हैं। दशहरे के करीब एक महीने पहले से पुतले बनाने का काम तेज हो जाता है। जैसे-जैसे विजयादशमी नजदीक आती है, उन्हें दिन-रात काम करना पड़ता है। अंतिम दिनों में वह एसी की मरम्मत का काम लगभग बंद कर देते हैं, ताकि पुतले समय पर तैयार हो सकें। इस काम में उनका पूरा परिवार सहयोग करता है। आसपास रहने वाले भाई और परिवार के दूसरे सदस्य भी पुतले बनाने में हाथ बंटाते हैं। खासकर जब दहन का दिन करीब आता है, तब सभी मिलकर ढांचे को अंतिम रूप देने, कपड़े लगाने और बाकी काम पूरा करने में जुट जाते हैं। जितेंद्र कहते हैं कि अकेले इतने बड़े पुतले तैयार करना आसान नहीं है। परिवार के लोगों के सहयोग से ही काम समय पर पूरा हो पाता है। उनके लिए यह पारिवारिक गतिविधि भी है, जिसमें सभी लोग अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं।



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