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भूषण झा बोले-'जीते तो पूरा वेतन ‘शिक्षक केयर-फंड’ में देंगे':40 स्कूलों में विकास के लिए खर्च होंगे 4 करोड़,'समान वेतनमान प्राथमिकता'




सीतामढ़ी के तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार भूषण कुमार झा ने कहा कि निर्वाचित होने पर वे अपना पूरा वेतन ‘शिक्षक केयर फंड’ में दान करेंगे। डुमरा स्थित गुरुकुल कॉलेज में आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि वर्ष 2019 से उनके द्वारा संचालित इस फंड का उद्देश्य घटना, दुर्घटना और प्राकृतिक आपदा की स्थिति में शिक्षकों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। उन्होंने इसे तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए देश में अनोखी पहल बताया। 40 स्कूलों में 10-10 लाख से होंगे विकास कार्य भूषण झा ने कहा कि विकास कार्यों के लिए मिलने वाली सालाना करीब चार करोड़ रुपये की राशि को 40 विद्यालयों में 10-10 लाख रुपये के हिसाब से खर्च कराया जाएगा। इसके लिए विद्यालयों में शिक्षकों का समूह बनाकर विकास कार्य कराने की बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन कार्यों के लिए किसी ठेकेदार को ठेका नहीं दिया जाएगा। समान वेतनमान और शिक्षकों के सम्मान का मुद्दा उन्होंने विभिन्न कोटि के शिक्षकों को एक कोटि में लाने और समान वेतनमान लागू कराने को अपनी प्राथमिकता बताया। शिक्षकों की समस्याओं का समाधान और उनके सम्मान की रक्षा को भी उन्होंने अपने एजेंडे में शामिल किया। प्रतिनिधित्व को व्यवसाय बनाने का लगाया आरोप चुनावी मैदान में मौजूद अन्य उम्मीदवारों पर निशाना साधते हुए झा ने आरोप लगाया कि कुछ उम्मीदवारों को शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की भूमिका, दायित्व और कर्तव्य की समुचित जानकारी नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने शिक्षक प्रतिनिधित्व को व्यवसाय और परिवार के पालन-पोषण का साधन बना लिया है। शिक्षकों को मिलने वाली सुविधाओं से जुड़े फंड के इस्तेमाल पर भी उन्होंने सवाल उठाए। बुनियादी सुविधाओं की कमी पर उठाए सवाल लंबे समय तक शिक्षक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए झा ने कहा कि स्कूलों में आज भी शुद्ध पेयजल, बेहतर वॉशरूम और शिक्षकों के बैठने जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। उन्होंने स्कूलों में शिकायत पेटी नहीं लगाए जाने का मुद्दा भी उठाया। 2006 में कैडर खत्म होने का भी उठाया मुद्दा झा ने वर्ष 2006 में शिक्षक के मूल कैडर समाप्त किए जाने और वेतनमान छह हजार रुपये से शुरू किए जाने का जिक्र करते हुए तत्कालीन शिक्षक प्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों के हितों से जुड़े ऐसे मुद्दों पर प्रभावी प्रतिनिधित्व की जरूरत है।



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