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पश्चिम चंपारण के बैरिया प्रखंड के एक युवा किसान ने मखाने की खेती को नई पहचान दी है। मिथिलांचल तक सीमित मानी जाने वाली मखाने की खेती अब पश्चिम चंपारण से निकलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच गई है। बैरिया के 28 साल के किसान रंजीत चौधरी ने चार साल पहले प्राकृतिक नदी में मखाने की खेती की शुरुआत की थी। आज उनका उत्पाद अर्जेंटीना, कनाडा, नेपाल और अफगानिस्तान जैसे देशों तक पहुंच रहा है। रंजीत ने खेती के साथ प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग को जोड़कर मखाने को एक नया बाजार दिया है। स्थानीय स्तर से शुरू हुआ उनका कारोबार अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और विदेशी ग्राहकों तक पहुंच चुका है। प्राकृतिक नदी में डाले बीज, एक साल में तैयार हुई फसल रंजीत चौधरी बताते हैं कि उन्होंने साल 2022 में पहली बार प्राकृतिक नदी में मखाने के बीज डाले थे। दिसंबर महीने में बीज बोए गए और अगले वर्ष सितंबर तक फसल तैयार हुई। मखाने की कटाई और प्रसंस्करण के लिए उन्होंने मिथिलांचल से अनुभवी मजदूरों को बुलाया। शुरुआती प्रयोग सफल रहा तो उन्होंने धीरे-धीरे खेती का दायरा बढ़ाया। आज वे 20 एकड़ क्षेत्र में मखाने की खेती कर रहे हैं। मखाने की खेती के लिए उन्होंने स्थानीय जल संसाधनों का उपयोग किया और वैज्ञानिक तरीके अपनाए। एक एकड़ से 600 किलो तक कच्चे मखाने का उत्पादन रंजीत के अनुसार, एक एकड़ में लगभग 10 किलो बीज की जरूरत होती है। इससे करीब 600 किलो कच्चा मखाना तैयार होता है। 20 एकड़ में उन्हें करीब 12 टन कच्चे मखाने की पैदावार मिलती है। बाजार में कच्चा मखाना 1200 से 1300 रुपए प्रति किलो तक बिकता है। वहीं, प्रोसेसिंग और फ्लेवरिंग के बाद इसकी कीमत 1700 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाती है। इससे किसानों को सामान्य खेती की तुलना में अधिक मुनाफा मिलता है। फ्लेवर और ब्रांडिंग से मिली नई पहचान रंजीत ने सिर्फ खेती तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने मखाने को अलग-अलग फ्लेवर में तैयार किया और आकर्षक पैकेजिंग के साथ बाजार में उतारा। मसाला, पुदीना, चीज, टमाटर और अन्य स्वाद वाले मखाने तैयार कर उन्होंने युवाओं और शहरी ग्राहकों को भी जोड़ा। पहले उन्होंने स्थानीय बाजार में अपनी पहचान बनाई। इसके बाद ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए देशभर में बिक्री शुरू की। डिजिटल माध्यमों से जुड़े ग्राहकों की मांग बढ़ी तो विदेशी बाजार के लिए भी रास्ते खुले। नेपाल से 2 हजार किलो की डिमांड, कनाडा-अर्जेंटीना में भेजे सैंपल रंजीत बताते हैं कि हाल ही में उन्होंने नेपाल, कनाडा, अर्जेंटीना और अफगानिस्तान में मखाने की आपूर्ति की है। नेपाल के एक शहर से उन्हें दो हजार किलो मखाने का ऑर्डर मिला, जिसे उन्होंने पूरा किया। इसके अलावा कनाडा में 100 किलो और अर्जेंटीना में 20 किलो मखाना सैंपल के रूप में भेजा गया है। इन देशों में उत्पाद की गुणवत्ता पसंद किए जाने के बाद आगे बड़े ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। रंजीत का कहना है कि भारतीय मखाने की मांग विदेशों में तेजी से बढ़ रही है। लोग इसे हेल्दी स्नैक के रूप में पसंद कर रहे हैं। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसके अच्छे अवसर हैं। दूसरे किसानों के लिए भी बन रहे प्रेरणा रंजीत की सफलता अब पश्चिम चंपारण के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। जिस क्षेत्र में पहले मखाने की खेती नहीं होती थी, वहां अब किसान इसकी संभावनाओं को समझने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को तकनीकी जानकारी, प्रोसेसिंग और बाजार की सुविधा मिले तो पश्चिम चंपारण में मखाने की खेती बड़े स्तर पर विकसित हो सकती है। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और जिले को नई पहचान मिलेगी। मिथिलांचल के बाद पश्चिम चंपारण बना नया केंद्र अब तक बिहार में मखाने की पहचान मुख्य रूप से मिथिलांचल क्षेत्र से जुड़ी रही है, लेकिन पश्चिम चंपारण के किसान इस परंपरा को नए क्षेत्रों तक पहुंचा रहे हैं। बैरिया के युवा किसान रंजीत चौधरी ने यह साबित कर दिया है कि नई सोच, तकनीक और मार्केटिंग के जरिए खेती को भी अंतरराष्ट्रीय कारोबार में बदला जा सकता है। उनकी यह पहल न सिर्फ पश्चिम चंपारण, बल्कि बिहार के कृषि क्षेत्र के लिए भी एक नई संभावनाओं का द्वार खोल रही है।
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पश्चिम चंपारण का मखाना अब विदेशों में मशहूर:युवा किसान ने अर्जेंटीना-कनाडा तक पहुंचाया स्वाद, 20 एकड़ में उत्पादन; फ्लेवर और ब्रांडिंग से बनाया अंतरराष्ट्रीय बाजार
