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सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल के अधिकार पर उठाया सवाल:शक्ति की होगी जांच; काउंसिल ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी के 2026 ग्रेजुएट्स का एनरोलमेंट रोका था




सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह जांच करेगा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को लॉ कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज को नियंत्रित और रेगुलेट करने का अधिकार है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि BCI की कानूनी जिम्मेदारी वकील के तौर पर लाइसेंस दिए जाने के बाद शुरू होती है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सवाल उठाया कि BCI को कानूनी शिक्षा रेगुलेट करने वाली विशेषज्ञ संस्था कैसे माना जा सकता है। शिक्षा से जुड़े मामलों को लॉ स्कॉलर्स और शिक्षाविद ज्यादा बेहतर तरीके से देख सकते हैं। दरअसल, BCI ने 13 अगस्त को सभी स्टेट बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि हैदराबाद की लॉ यूनिवर्सिटी NALSAR के 2026 बैच के किसी भी ग्रेजुएट को अगले आदेश तक वकील के तौर पर एनरोल न किया जाए। कोर्ट ने BCI से दो हफ्ते में जवाब मांगा सुप्रीम कोर्ट बीसीआई-पर्ल फर्स्ट ट्रस्ट के कामकाज और ट्रस्ट की ओर से लॉ कॉलेज खोलने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने नोटिस जारी कर BCI से दो हफ्ते में जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता गिरीश मित्तल की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि BCI ने 2016 में एक प्रस्ताव पारित कर पुराने ट्रस्ट को खत्म कर उसकी रकम नए ट्रस्ट में ट्रांसफर कर दी थी। उन्होंने बताया कि 2020 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट फॉर प्रमोशन ऑफ एजुकेशन, लीगल एंड प्रोफेशनल रिफॉर्म्स एंड इम्प्रूवमेंट इन रिसर्च बनाया गया। भूषण ने कहा कि ट्रस्ट की डीड में 11 मैनेजिंग ट्रस्टी को मूल और स्थायी ट्रस्टी बनाया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि BCI में उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद भी वे ट्रस्टी बने रह सकते थे। बाद में इस ट्रस्ट ने गोवा और आंध्र प्रदेश में एक-एक लॉ कॉलेज स्थापित किया। BCI चेयरपर्सन मनन के कार्यकाल पर भी सवाल उठे सुप्रीम कोर्ट इससे पहले BCI चेयरपर्सन मनन कुमार मिश्रा के पद को प्रो-टेम बता चुका है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि उन्हें कोई भी नीतिगत फैसला लेने से पहले भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से सलाह लेनी होगी। इससे पहले मिश्रा के लंबे कार्यकाल को चुनौती देते हुए उनकी पद से हटाने की मांग वाली याचिका भी दाखिल की गई थी। वकील योगमाया एम.जी. की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि मिश्रा पहली बार 2012 तक BCI चेयरमैन चुने गए थे। उन्होंने 2014 में कुछ समय के लिए पद छोड़ा, लेकिन उसी साल नवंबर में दोबारा चेयरमैन बन गए और तब से पद पर बने हुए हैं।



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