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- Supreme Court Verdict On Corporate Criminal Liability | Sanofi India Case
नई दिल्ली13 मिनट पहले
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सनोफी इंडिया एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है, जिसका मुख्य कारोबार दवाएं बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कंपनियों के खिलाफ आपराधिक मामलों को लेकर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ इसलिए किसी कंपनी के खिलाफ केस खत्म नहीं किया जा सकता कि जिस कर्मचारी या अधिकारी के जरिए अपराध हुआ, उसकी पहचान नहीं हो पाई या उसे आरोपी नहीं बनाया गया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने सुनवाई के बाद फार्मा कंपनी सनोफी इंडिया लिमिटेड की अपील खारिज कर दी।
यह मामला दवा बनाने वाली कंपनी सनोफी इंडिया लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी के खिलाफ CBI ने मामला दर्ज किया था।
कंपनी ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही खत्म करने से इनकार किया गया था।
फैसले के बाद अब किसी कंपनी के खिलाफ केस सिर्फ इस आधार पर खत्म नहीं होगा कि जिस आदमी ने अपराध किया, उसका नाम नहीं पता या उसे आरोपी नहीं बनाया गया।

दवा खरीद में फायदे के लिए रिश्वत देने का आरोप
यह मामला BARC के लिए दवाओं की खरीद से जुड़ा CBI का केस है। चार्जशीट में आरोप लगाया गया था कि BARC के एक अधिकारी ने सनोफी इंडिया के साथ मिलकर महंगी दरों पर दवाएं खरीदीं और गलत फायदा पहुंचाने के बदले रिश्वत दी गई।
सनोफी इंडिया एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है, जिसका मुख्य कारोबार दवाओं का निर्माण है। इस मामले में कंपनी के साथ उसका कोई कर्मचारी या अधिकारी आरोपी नहीं बनाया गया था।
कंपनी ने कोर्ट में रखीं 5 दलीलें
- अपराध के लिए गलत नीयत यानी मेंस रिया जरूरी है।
- कंपनी के पास इंसान जैसी अपनी कोई नीयत नहीं होती।
- कंपनी को दोषी पाया भी गया तो उसे जेल नहीं भेजा जा सकता।
- इसलिए उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई खत्म कर दी जानी चाहिए।
- कर्नाटक हाईकोर्ट ने कंपनी की यह मांग नहीं मानी। इसके बाद कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट ने 98 पेज का फैसला लिखा
जस्टिस जेबी पारदीवाला ने 98 पन्नों का फैसला लिखा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कंपनी की अपील खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी का नाम आरोपी के तौर पर नहीं होना, अपने आप में कंपनी के खिलाफ केस खत्म करने की वजह नहीं बन सकता।
यानी अगर चार्जशीट में पहली नजर में यह दिखता है कि कंपनी ने अपराध किया है या अपराध में उसकी भूमिका रही है, तो कंपनी के खिलाफ केस चल सकता है।
बेंच के सामने यह सवाल था कि क्या हाईकोर्ट को कंपनी के खिलाफ शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही खत्म कर देनी चाहिए थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी पर तभी मुकदमा नहीं चल सकता, जब अपराध में केवल जेल की सजा हो या अपराध की प्रकृति ऐसी हो कि उसमें व्यक्तिगत दुर्भावनापूर्ण मंशा जरूरी हो और कंपनी वह अपराध कर ही न सकती हो।
भास्कर नॉलेज- क्या है मेंस रिया
एक कानूनी शब्द है, जिसका सीधा मतलब है- “अपराधी का इरादा” या “दोषी मन”।कानून की भाषा में किसी भी गलती को ‘जुर्म’ तभी माना जाता है जब वह जान-बूझकर की गई हो।
‘मेंस रिया’ का मतलब है कि क्या उस व्यक्ति का मन साफ़ था या उसने बुरा करने की नीयत से ही वह काम किया था। अगर नीयत खराब थी, तो कानून उसे ‘मेंस रिया’ मानकर सजा देता है।

चार्जशीट में कंपनी का अपराध दिखना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट को पहली नजर में यह दिखाना चाहिए कि अपराध कंपनी ने खुद किया है। कंपनी की भूमिका उसके काम, फैसलों और लेन-देन से जुड़े आरोपों से सामने आ सकती है। इसके लिए उस खास व्यक्ति का नाम देना जरूरी नहीं है, जिसने ये काम किए हों।
- भारत और दूसरे देशों में कंपनियों को आपराधिक जिम्मेदारी के दायरे में लाया जाता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि कंपनियों के पास बहुत ज्यादा आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक ताकत होती है और वे गंभीर नुकसान पहुंचाने में सक्षम होती हैं।
- पहली नजर में यह सवाल आसान लग सकता है, लेकिन करीब से देखने पर यह काफी जटिल है। उसने कहा कि कॉर्पोरेट आपराधिक जिम्मेदारी लंबे समय से कठिन विषय रही है।
- इसके पीछे दो बुनियादी धारणाएं हैं। पहली, कंपनी अपने सदस्यों से अलग पहचान रखने वाली एक कृत्रिम इकाई है। दूसरी, कंपनी एक अमूर्त संस्था है।
व्यक्ति की पहचान के बिना भी मंशा का आकलन संभव
कोर्ट ने कहा कि शुरुआती चरण में आसपास के तथ्यों और परिस्थितियों से मेंस रिया का अनुमान लगाया जा सकता है। इसके लिए किसी खास व्यक्ति की पहचान जरूरी नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किस व्यक्ति को कंपनी से जोड़ा जाए, इसका आकलन ट्रायल के दौरान किया जाएगा।
फैसले में कहा गया कि कंपनी की सीधी आपराधिक जिम्मेदारी वाले मामलों में किसी प्राकृतिक व्यक्ति को आरोपी न बनाया जाना, अकेले कार्यवाही खत्म करने का आधार नहीं हो सकता।
हालांकि, बेंच ने साफ किया कि कंपनियों को आपराधिक कार्यवाही खत्म करने के सामान्य नियमों से कोई विशेष छूट नहीं है।
कंपनी की जिम्मेदारी तय करने के लिए 3 चरणों का ढांचा
सुप्रीम कोर्ट ने यह तय करने के लिए तीन चरणों वाला नया क्रमबद्ध ढांचा बताया कि किसी व्यक्ति के कृत्य और उसकी आपराधिक मंशा को कंपनी से कैसे जोड़ा जाए।
- पहले चरण में कोर्ट को कंपनी के संवैधानिक दस्तावेज यानी आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन देखने होंगे। इससे पता चलेगा कि कंपनी की ओर से काम करने का अधिकार किसे दिया गया था।
- दूसरे चरण में यह देखा जाएगा कि यह अधिकार ऐसे व्यक्ति को सौंपा गया था या नहीं, जिसके पास पर्याप्त स्वतंत्रता और अपने स्तर पर फैसला लेने की क्षमता थी। इसके लिए उस व्यक्ति का आधिकारिक पद महत्वपूर्ण नहीं होगा।
- अगर पहले दोनों चरणों से स्थिति साफ नहीं होती, तो कोर्ट संबंधित कानून के उद्देश्य और नीति के आधार पर “विशेष आरोपण नियम” बना सकता है।
कोर्ट ने कहा कि मेंस रिया अपराधों में कॉर्पोरेट आपराधिक जिम्मेदारी से जुड़े सवाल काफी मुश्किल होते हैं। इन पर आगे कानून बनाने और इस पूरे क्षेत्र के रिव्यू की जरूरत पड़ सकती है।

