बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। पद छोड़ने से पहले उन्होंने विधान परिषद सचिवालय में लंबित नियुक्ति प्रक्रियाओं को पूरा कराया। उन्होंने 121 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र बांटे थे। सितंबर में दो चरणो
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इस्तीफे और नियुक्ति पत्र वितरण के बीच यही कड़ी अब चर्चा का विषय है। सवाल उठ रहा है कि क्या सभापति ने पद छोड़ने से पहले अपने कार्यकाल में शुरू हुई भर्ती प्रक्रियाओं को अंतिम मुकाम तक पहुंचाने के लिए इंतजार किया था? दैनिक भास्कर की इनसाइड रिपोर्ट में जानिए पूरी कहानी…।
इस्तीफा के निर्देश मिलने के बाद अवधेश सिंह ने मांगा समय
अवधेश नारायण सिंह को विधान परिषद के सभापति पद से हटाए जाने की सियासी चर्चा 21 सितंबर 2026 से तेज हुई। वे भाजपा कोटे से सभापति बने थे। उनके पद छोड़ने की चर्चा के साथ ही NDA के भीतर नए सभापति को लेकर भी कयास शुरू हो गए। पद के भाजपा से जदयू कोटे में जाने की चर्चा ने इस घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया।
सूत्रों के मुताबिक, 21 सितंबर के बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से सभापति को इस्तीफा देने का संदेश मिल गया था। इसके बाद अवधेश सिंह ने रिजाइन करने के लिए करीब एक सप्ताह का समय मांगा।
सभापति चाहते थे कि उनके कार्यकाल में शुरू हुई भर्ती प्रक्रियाओं को अंतिम रूप दे दिया जाए। कई पदों के अंतिम परिणाम पहले ही जारी हो गए थे। चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति और ज्वाइनिंग की औपचारिकता बाकी थी। इस दौरान सचिवालय में उन भर्तियों की प्रक्रिया पूरी की गई।
अवधेश नारायण ने 10 और 22 सितंबर को नियुक्ति पत्र बांटे थे। सूत्रों के अनुसार उन्होंने अभ्यर्थियों की ज्वाइनिंग का इंतजार किया। ज्वाइनिंग की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पद छोड़ दिया।

क्या नए सभापति के आने के बाद अटक सकती थी नियुक्ति प्रक्रिया?
यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम सवाल है। विधान परिषद और विधानसभा सचिवालय में भर्ती प्रक्रिया पदाधिकारियों के कार्यकाल से भी जुड़ी होती है। ऐसी स्थिति में सभापति या स्पीकर बदलने के बाद लंबित प्रक्रियाओं को लेकर नए पदाधिकारी स्तर पर निर्णय बदल सकते हैं।
इसी वजह से सूत्रों का कहना है कि जिन नियुक्तियों की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी, उन्हें पूरा कर देना जरूरी समझा गया। हालांकि, नियुक्ति प्रक्रिया को नया सभापति अनिवार्य रूप से रद्द ही करेंगे, ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है। फिर भी अवधेश नारायण सिंह कोई चांस लेना नहीं चाहते थे।
इस्तीफा से पहले 2 चरणों में 121 नियुक्तियां बांटी


22 सितंबर में दो चरणों में कुल 121 अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रक्रिया को नियुक्ति पत्र वितरण तक पहुंचाया गया।
ये नियुक्तियां किस भर्ती से जुड़ी थीं?
जिन पदों पर भर्ती हुई उनके लिए अलग-अलग समय पर विज्ञापन जारी किए गए थे। पहले चरण में निजी सहायक के पद के लिए विज्ञापन संख्या 02/2025 के तहत भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसका विज्ञापन वर्ष 2025 में जारी किया गया था।
वहीं, सुरक्षा प्रहरी के पदों के लिए विज्ञापन 2023 में जारी किया गया था। कार्यालय परिचारी समेत अन्य पदों की भर्ती प्रक्रिया भी संबंधित विज्ञापनों के आधार पर आगे बढ़ी।

कौन होंगे विधान परिषद के अगले सभापति?
अवधेश नारायण सिंह के बाद सभापति पद के लिए JDU के सीनियर नेता और वर्तमान उपसभापति रामवचन राय का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। रामवचन को सदन के कामकाज और संसदीय प्रक्रियाओं का लंबा अनुभव है।
वर्तमान में वे बिहार विधान परिषद के उपसभापति हैं। 2024 में उन्हें निर्विरोध उपसभापति चुना गया था। इससे पहले वे पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से भी जुड़े रहे हैं। उनकी शैक्षणिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए सभापति पद के संभावित दावेदार के तौर पर उनका नाम चर्चा में है।

नए उप-सभापति कौन होंगे?
विधान परिषद के सभापति पद पर बदलाव के बाद अब भाजपा के भीतर अगली नजर उप-सभापति पद पर है। इस पद के लिए नाम तय करने को लेकर पार्टी के अंदर मंथन तेज हो गई है।
मामला सिर्फ सदन में एक पद भरने का नहीं है, बल्कि इसके जरिए परिषद में पार्टी का प्रतिनिधित्व और अंदरूनी संतुलन साधने पर भी चर्चा हो रही है।
पार्टी का शीर्ष नेतृत्व दिल्ली में संभावित नामों पर विचार कर रहा है। बिहार भाजपा के स्तर पर भी नामों को लेकर राय ली जा रही है। ऐसे में अंतिम फैसला प्रदेश स्तर की पसंद के साथ शीर्ष नेतृत्व की सहमति से तय होने के संकेत हैं।
उप-सभापति पद के लिए जनक राम, डॉ. राजेंद्र गुप्ता और सुनील चौधरी के नाम चर्चा में हैं। इनमें से किस एक नाम पर सहमति बनानी है। इसके लिए पार्टी के भीतर अलग-अलग स्तर पर विचार चल रहा है। नाम तय करते समय सदन के अनुभव, संगठन में भूमिका और पार्टी के मौजूदा राजनीतिक समीकरण जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखे जाने की चर्चा है।
