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सिर्फ रक्षाबंधन पर खुलता है उत्तराखंड का ये मंदिर:15Km पैदल चलने के बाद भगवान को राखी बांधती हैं बहनें, विष्णु-राजा बलि से जुड़ी है कहानी




आज घर-घर में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध रही हैं। लेकिन उत्तराखंड के चमोली में रक्षाबंधन का एक ऐसा रंग देखने को मिलता है, जहां भाई को राखी बांधने से पहले भगवान नारायण को रक्षा सूत्र अर्पित किया जाता है। उर्गम घाटी के ऊंचे पहाड़ों में मौजूद बंसी नारायण मंदिर के कपाट साल में सिर्फ एक दिन, रक्षाबंधन पर खुलते हैं। यह मंदिर समुद्र तल से करीब 3,600 मीटर यानी 11,772 फीट की ऊंचाई पर है। यहां पहुंचने के लिए देवग्राम तक सड़क जाती है, लेकिन इसके बाद करीब 12 से 15 किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना पड़ता है। मंदिर तक पहुंचने की कठिन चढ़ाई, आसपास के बुग्याल और हिमालयी चोटियों का नजारा इसे बाकी मंदिर यात्राओं से अलग बनाता है। मंदिर से जुड़ी 3 बड़ी मान्यताएं… बंसी नारायण मंदिर को लेकर अलग-अलग धार्मिक और स्थानीय मान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें तीन प्रमुख मान्यताएं इस मंदिर को रक्षाबंधन से जोड़ती हैं। 1. 364 दिन नारद करते हैं भगवान की पूजा स्थानीय मान्यता है कि देवर्षि नारद साल के 364 दिन भगवान नारायण की पूजा करते हैं। इस वजह से आम लोगों के लिए मंदिर में पूजा और दर्शन का अवसर सिर्फ एक दिन होता है। यह दिन श्रावण पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन का होता है। इसी दिन मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और श्रद्धालु भगवान नारायण के दर्शन कर उन्हें रक्षा सूत्र बांधते हैं। रक्षाबंधन के दिन आसपास के गांवों के लोग भी यहां पहुंचते हैं। खास तौर पर कालगोठ गांव से हर घर से मक्खन मंदिर में चढ़ाने की परंपरा बताई जाती है। इसी मक्खन से प्रसाद तैयार किया जाता है। 2. पाताल लोक से लौटकर इसी जगह प्रकट हुए नारायण दूसरी मान्यता भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना प्रभाव जमा लिया था। भगवान विष्णु ने वामन का रूप धारण किया और बलि से तीन पग भूमि मांगी। बलि के वचन देने के बाद वामन ने विराट रूप धारण किया और दो कदमों में पृथ्वी और आकाश नाप लिया। तीसरा कदम रखने के लिए जब कोई जगह नहीं बची तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। इसके बाद भगवान ने उन्हें पाताल लोक भेज दिया। मान्यता के मुताबिक भगवान विष्णु भी बलि के साथ पाताल लोक चले गए। भगवान विष्णु को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी ने नारद से उपाय पूछा। नारद ने उन्हें श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधने की सलाह दी। माता लक्ष्मी ने बलि को राखी बांधी और बदले में भगवान विष्णु को वापस अपने साथ ले जाने का आग्रह किया। स्थानीय मान्यता है कि पाताल लोक से लौटते समय भगवान नारायण इसी स्थान पर प्रकट हुए थे। 3. ‘बंसी’ नाम भगवान कृष्ण की बांसुरी से जुड़ा मंदिर के नाम को लेकर तीसरी मान्यता भगवान कृष्ण से जुड़ी है। स्थानीय परंपरा में ‘बंसी’ को कृष्ण की बांसुरी से जोड़ा जाता है। कुछ स्थानीय विवरणों में मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने यहां बंसी बजाई थी और रासलीला की थी। यह भी कहा जाता है कि सच्चे भक्तों को यहां कृष्ण की बांसुरी की धुन सुनाई दे सकती है। यह धार्मिक लोकमान्यता है, जिसका ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। मंदिर में मुख्य रूप से भगवान विष्णु की चतुर्भुज प्रतिमा स्थापित है, इसलिए अलग-अलग विवरणों में इसे विष्णु और कृष्ण दोनों से जोड़ा जाता है। रक्षाबंधन पर भगवान को पहले राखी क्यों? बंसी नारायण मंदिर की सबसे अलग परंपरा यही है। रक्षाबंधन पर महिलाएं और युवतियां मंदिर पहुंचकर पहले भगवान नारायण को रक्षा सूत्र बांधती हैं। इसके बाद अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधने की परंपरा निभाई जाती है। उर्गम घाटी के किमाणा, डुमक, कलगोठ, जखोला, पल्ला और आसपास के गांवों के लोग इस दिन मंदिर पहुंचते हैं। इसलिए रक्षाबंधन यहां सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आसपास के गांवों का सामूहिक उत्सव भी बन जाता है। 11,772 फीट पर बसा है मंदिर बंसी नारायण मंदिर करीब 3,600 मीटर यानी 11,772 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह बुग्याल क्षेत्र है, जहां गर्मियों में पहाड़ी घास के खुले मैदान दिखाई देते हैं। मंदिर के आसपास ओक और बुरांश के जंगल हैं। मौसम साफ हो तो नंदा देवी, त्रिशूल और नंदा घुंटी की चोटियों के दर्शन हो सकते हैं। यह इलाका पक्षियों के लिए भी जाना जाता है। ट्रेक के दौरान हिमालयन मोनाल, लाल चोंच वाली नीली मैगपाई, स्केली ब्रेस्टेड वुडपेकर, खलीज तीतर और धारीदार लाफिंग थ्रश जैसी पक्षी प्रजातियां दिखाई दे सकती हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए करना होगा ट्रेक बंसी नारायण मंदिर तक वाहन से सीधे नहीं पहुंचा जा सकता। सड़क मार्ग से देवग्राम तक पहुंचना होता है। इसके बाद पैदल रास्ता शुरू होता है। देवग्राम से मंदिर की दूरी करीब 12 से 15 किलोमीटर है। इसे पूरा करने में करीब 6 से 8 घंटे लग सकते हैं। ऊंचाई और चढ़ाई के कारण नियमित ट्रेकिंग नहीं करने वालों के लिए यह यात्रा थकाने वाली हो सकती है।



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